॥ वैदिक जीवन ॥


॥ पुरुषार्थ (निष्कर्ष) ॥

पुरुषार्थ का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥


धर्मार्थकाममोक्षाणां निमित्तं किमुच्यते। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (पुरुषार्थ चतुष्टय) की प्राप्ति का कारण क्या कहा गया है? यदेतन्मानुषं जन्म स हि तावत्सुदुर्लभम्॥ निश्चित रूप से वह यह 'मनुष्य जन्म' ही है, जो वास्तव में अत्यंत दुर्लभ है॥ — (भागवत 11.2.29)




॥ पुरुषार्थ (आधार) ॥


"पुरुषार्थ" शब्द संस्कृत के "पुरुष" (यहाँ 'मानव' या 'विवेकशील प्राणी' के अर्थ में) और "अर्थ" (लक्ष्य, उद्देश्य) से मिलकर बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है — "मनुष्य का उद्देश्य" या "वह लक्ष्य जिसकी प्राप्ति के लिए मनुष्य प्रयास करता है"। मीमांसा दर्शन के अनुसार, "जिस कर्म से मनुष्य को सुख प्राप्त होता है और जिसे करने की इच्छा स्वयं ही होती है, वह पुरुषार्थ है"। सांख्य दर्शन में पुरुषार्थ को "त्रिविध दुःखों की निवृत्ति" के रूप में देखा गया है, अर्थात् जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति ही परम पुरुषार्थ है।


वैदिक काल से लेकर उपनिषद, महाभारत, मनुस्मृति, अर्थशास्त्र, कामसूत्र, उपनिषद, गीता, पुराण, और बाद के दार्शनिक ग्रंथों तक पुरुषार्थ की अवधारणा का निरंतर विकास हुआ है। प्रारंभ में त्रिवर्ग — धर्म, अर्थ, काम — को ही मुख्य पुरुषार्थ माना गया था, किंतु उपनिषद और गीता के काल में मोक्ष को परम पुरुषार्थ के रूप में जोड़ा गया। मनुस्मृति (2.224) में त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का उल्लेख है, जबकि उपनिषद और गीता में मोक्ष को सर्वोच्च लक्ष्य बताया गया है।


मीमांसा दर्शन के अनुसार, "जिस कर्म से मनुष्य को सुख प्राप्त होता है और जिसे करने की इच्छा स्वाभाविक रूप से होती है, वह पुरुषार्थ है"। वहीं सांख्य दर्शन इसे "सभी प्रकार के दुःखों की निवृत्ति" (मुक्ति) के रूप में देखता है।

इसे केवल एक आध्यात्मिक विचार मान लेना भूल होगी। आचार्य चाणक्य ने इसे शासन, अर्थशास्त्र और व्यक्तिगत अनुशासन के एक ठोस ढांचे के रूप में देखा है।


सुखस्य मूलं धर्मः। धर्मस्य मूलमर्थः। सुख का आधार धर्म है। धर्म का आधार अर्थ (संसाधन) है। अर्थस्य मूलं राज्यम्। राज्यस्य मूलमिन्द्रियजयः। अर्थ का आधार राज्य (संगठन) है। राज्य का आधार इंद्रियों पर विजय (आत्म-संयम) है। इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः। विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा। इंद्रिय-विजय का आधार विनय (अनुशासन) है। विनय का आधार वृद्धों (अनुभवी विद्वानों) की सेवा है। वृद्धसेवया विज्ञानम्। विज्ञानेनात्मानं सम्पादयेत्। अनुभवी जनों की सेवा से विशिष्ट ज्ञान प्राप्त होता है। उस ज्ञान से स्वयं को कार्यक्षम बनाएँ। सम्पादितात्मा जितात्मा भवति॥ जिसने स्वयं को इस प्रकार कुशल बना लिया, वह परिस्थितियों को जीतने वाला होता है॥ — (चाणक्य नीति सूत्र)


चाणक्य का यह सूत्र स्पष्ट करता है कि सुख हवा में नहीं मिलता, इसकी आरम्भ व्यक्तिगत अनुशासन (विनय), ज्ञान और संसाधनों (अर्थ) से होती है, जो अंततः धर्म पर आधारित होते हैं।


केवल चार पुरुषार्थ ही क्यों? (अनंत इच्छाओं का वर्गीकरण)


सनातन दर्शन का यह एक अत्यंत गहरा और विचारणीय प्रश्न है। मानव मन की इच्छाएं और लक्ष्य अनंत प्रतीत होते हैं—ज्ञान, शक्ति, कला, विज्ञान, प्रसिद्धि, सब कुछ। तो फिर जीवन के लक्ष्यों को केवल चार (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में ही क्यों समेटा गया?


हमारे ऋषियों ने मानव जीवन की पूरी मनोवैज्ञानिक संरचना का गहन अध्ययन किया और पाया कि मनुष्य की हर एक इच्छा केवल चार मूल प्रवृत्तियों (Drivers) से ही उत्पन्न होती है। कोई भी इच्छा का उद्गम या तो नैतिक है, या भौतिक या मानसिक अथवा आध्यात्मिक। इन्ही चार रूपों को उन्होने पुरुषार्थ का नाम दिया।


  1. धर्म (नैतिक - Universal Order) - क्या उचित है और क्या अनुचित? समाज के प्रति हमारा कर्तव्य, सत्यनिष्ठा, और और अपने स्वभाव से समंजस्य बिठाना ही 'धर्म' है। जैसे - समाज सेवा, न्याय, पर्यावरण की रक्षा।
  2. अर्थ (भौतिक - Material Achievements) - जीवन जीने के लिए संसाधन। शक्ति, पद, सत्ता, विज्ञान, और तकनीकी विकास—ये सभी 'अर्थ' के अंतर्गत आते हैं। बिना 'अर्थ' के न तो धर्म का पालन हो सकता है और न ही समाज का विकास।
  3. काम (मानसिक - Emotional Desires) - भावनात्मक और शारीरिक संतुष्टि। कला, संगीत, साहित्य, और रचनात्मकता के माध्यम से मिलने वाला रसानंद (Aesthetic pleasure) 'काम' का ही परिष्कृत रूप है। यह जीवन को सुंदर बनाता है।
  4. मोक्ष (आध्यात्मिक - Spiritual Liberation) - इन सभी के बाद भी मन में उठने वाला अंतिम प्रश्न— 'मैं कौन हूँ?'। जीवन-मरण के चक्र और सभी सांसारिक बंधनों के पार जाकर परम आत्मज्ञान प्राप्त करना 'मोक्ष' है।

पुरुषार्थजीवन का स्तर (Dimension)मुख्य कार्य (Function)
धर्मनैतिक (Ethical - ऋत)व्यक्तिगत, सामाजिक और प्राकृतिक संतुलन।
अर्थभौतिक (Material - अर्जन)जीविकोपार्जन, सुरक्षा और संसाधनों का निर्माण।
काममानसिक (Emotional - भावनात्मक)इच्छाओं की पूर्ति और रसानंद की अनुभूति।
मोक्षआध्यात्मिक (Spiritual - मुक्ति)आत्मज्ञान एवं परम स्वतंत्रता (मुक्ति)।

पुरूषार्थ के सूत्र - साधना चतुष्टय


मैं जानता हूँ की मैंने जो सूत्र दिएँ हैं वो कोई भी शास्त्र पुरुषार्थों के लिए प्रमाणित नहीं करता। परंतु हमारा अधिकतर शास्त्र मुमुक्षु है। शास्त्रों ने जो सूत्र प्रदान किए हैं प्रायः मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से ही किए हैं। उनमे से सबसे प्रमुख है साधना चतुष्टय। ये व्यक्ति के पुरुषार्थ को धर्म की ओर मोड़ देते हैं और अंतोगत्वा सन्यास प्राप्ति और मोक्ष प्राप्ति ही इसका उद्देश्य है। परंतु हम संसार में गृहस्थ के लिए पुरुषार्थ के सूत्र दे रहे थे। इसीलिए वह सूत्र भिन्न थे और मैंने स्वयं अन्वेषण कर खोजे किए थे। फिर भी वह सूत्र व्यक्ति को पता होने चाहिए तो हम उन्हे नीचे दे रहे हैं॥


जीवन के चार पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—हमें संसार में जीने और उससे ऊपर उठने का मार्ग दिखाते हैं। जहाँ प्रथम तीन पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम) हमें संसार के कर्तव्यों और सुखों में संतुलित रखते हैं, वहीं अंतिम पुरुषार्थ 'मोक्ष' की प्राप्ति बिना आंतरिक योग्यता के संभव नहीं है। इसी योग्यता को वेदांत में 'साधना चतुष्टय' कहा गया है। यह वह चार साधन हैं जो साधक को सांसारिक मोह (काम-अर्थ) से मुक्त कर मोक्ष के द्वार तक ले जाते हैं॥


साधनान्यत्र चत्वारि कथितानि मनीषिभिः मनीषियों ने साधना के चार साधन बताए हैं।

येषु सत्स्वेव सन्निष्ठा यदभावे न सिध्यति॥ जिनमें स्थिरता होने पर ही साधक सिद्धि प्राप्त करता है, इनके अभाव में सिद्धि नहीं होती।

— विवेकचूडामणि (१७)


  1. विवेक - विवेक का अर्थ है 'नित्य' और 'अनित्य' के बीच भेद करने की शक्ति। जब मनुष्य यह जान लेता है कि केवल ब्रह्म (परमात्मा) ही सत्य और नित्य है, और यह दृश्य जगत परिवर्तनशील व अनित्य है, तो वह 'धर्म' के वास्तविक स्वरूप को समझने लगता है।

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चयः ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है — ऐसा दृढ़ निश्चय करना।

सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेकः समुदाहृतः॥ यही नित्यानित्य वस्तु का विवेक कहा गया है।

— विवेकचूडामणि (२०)


  1. वैराग्य - विवेक से उत्पन्न हुई विरक्ति ही वैराग्य है। इसका अर्थ संसार को छोड़ना नहीं, अपितु संसार के भोगों (काम और अर्थ) की नश्वरता को देखकर उनमें आसक्ति न रखना है। यह पुरुषार्थ के 'काम' तत्व को परिष्कृत कर उसे मोक्षोन्मुख बनाता है।

तद्वैराग्यं जिहासा या दर्शनश्रवणादिभिः वैराग्य वही है, जो दर्शन, श्रवण आदि से प्राप्त ज्ञान के आधार पर त्याग की इच्छा उत्पन्न करे।

देहादिब्रह्मपर्यन्ते ह्यनित्ये भोगवस्तुनि॥ जो देह से लेकर ब्रह्मलोक तक सभी अनित्य भोगवस्तुओं को त्यागने की आकांक्षा रखे।

— विवेकचूडामणि (२१)


  1. षट्-संपत्ति - यह छह मानसिक गुणों का समूह है जो साधक के चरित्र का निर्माण करते हैं और उसे मानसिक विक्षेपों से बचाते हैं -
    • शम: मन का निग्रह।
    • दम: बाह्य इंद्रियों का दमन।
    • उपरति: विषयों से स्वाभाविक विरक्ति।
    • तितिक्षा: द्वंद्वों (सुख-दुःख) को सहने की शक्ति।
    • श्रद्धा: गुरु और वेदांत वाक्यों में अटूट विश्वास।
    • समाधान: बुद्धि की एकाग्रता।

  1. मुमुक्षुत्व - यह साधना चतुष्टय का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण अंग है। इसका अर्थ है—मोक्ष की तीव्र इच्छा। जैसे जलता हुआ व्यक्ति जल की खोज करता है, वैसे ही संसार के दुखों से त्रस्त व्यक्ति जब केवल मुक्ति (मोक्ष) की अभिलाषा करता है, तो उसे मुमुक्षु कहते हैं।

अहंकारार्दिदेहान्तं बन्धं अज्ञानकल्पितम् अहंकार से लेकर देह तक का बन्धन अज्ञान से कल्पित है।

स्वस्वरूपावबोधेन मोक्तुमिच्छा मुमुक्षुता॥ अपने स्वरूप का बोध पाकर उस बन्धन से मुक्त होने की तीव्र इच्छा ही मुमुक्षुता है।

— विवेकचूडामणि (२७)


पुरुषार्थ (जीवन के लक्ष्य)साधना चतुष्टय (आंतरिक पात्रता)मुख्य उद्देश्य
धर्म (कर्तव्य)विवेकसत्य और असत्य की पहचान करना।
अर्थ (संसाधन)वैराग्यभौतिक संसाधनों में आसक्ति का त्याग।
काम (इच्छाएँ)षट्-संपत्तिमन और इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना।
मोक्ष (मुक्ति)मुमुक्षुत्वजन्म-मृत्यु के चक्र से छूटने की तीव्र तड़प।

ऐसा ही कुछ तैत्तिरीय उपनिषद में भी दिया गया है। परंतु वह मेरे सूत्रों से मेल खाता है। और आपको उसे पुनः समझने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। जब शिष्य अपनी शिक्षा पूर्ण कर गृहस्थ आश्रम (संसार) में प्रवेश करने वाला होता है, तब आचार्य उसे जीवन के पुरुषार्थों को सिद्ध करने के लिए साक्षात् आदेश देते हैं वह श्लोक कुछ इस प्रकार है॥


सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः
सत्य बोलो। धर्म का पालन करो। स्वाध्याय (अध्ययन) में प्रमाद मत करो।

आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः॥
आचार्य को प्रिय धन देकर, वंश परंपरा को मत तोड़ो।

धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्।
धर्म में प्रमाद नहीं करना चाहिए। कल्याण में प्रमाद नहीं करना चाहिए। समृद्धि में प्रमाद नहीं करना चाहिए।

— तैत्तिरीय उपनिषद् (शिक्षावल्ली, ११)


यदि आप केवल भगवत प्राप्ति के लिए ये पुस्तक का अनुशीलन कर रहे हो और सांसारिक मोह माया से ऊपर उठना चाहते हो तो ये साधना चतुष्टय का पथ आपके लिए सुलभ है। परंतु मैं यह पुस्तक वस्तुनिष्ठ रूप से नीति के लिए लिख रहा हूँ। तो मैं इसे यहाँ केवल मुमुक्षुओं के लिए लिख रहा हूँ परंतु मैं चाहूँगा की आप मेरे दिए सूत्रों को अपने जीवन में प्रयोग करने का प्रयास अवश्य करे। वह आपको अधिक सामंजस्यपूर्ण जीवन देगा॥


वर्णाश्रम व्यवस्था: पुरुषार्थ का टाइम-मैनेजमेंट


अब प्रश्न उठता है कि इन चारों को जीवन में कैसे उतारा जाए? एक ही समय में व्यक्ति धन भी कमाए, वैराग्य भी साधे और इच्छाओं की पूर्ति भी करे—यह तो विरोधाभासी है। यहीं पर भारतीय दर्शन की 'आश्रम व्यवस्था' सामने आती है। यह व्यवस्था पुरुषार्थों को साधने का एक मनोवैज्ञानिक 'टाइम-मैनेजमेंट' टूल है। जीवन को चार चरणों (आश्रमों) में बांटा गया है, जहाँ प्रत्येक चरण में किसी विशेष पुरुषार्थ पर अधिक बल दिया जाता है -


आश्रम (जीवन का चरण)प्रमुख पुरुषार्थआधुनिक जीवन में इसका स्वरूप (Relevance)
ब्रह्मचर्य (विद्यार्थी जीवन)धर्मशिक्षा ग्रहण करना, कौशल (skills) सीखना, चरित्र निर्माण और अनुशासन।
गृहस्थ (पारिवारिक जीवन)अर्थ, काम (धर्म के अधीन)करियर बनाना, परिवार का पोषण, समाज की अर्थव्यवस्था में योगदान और इच्छाओं की पूर्ति।
वानप्रस्थ (सेवानिवृत्ति)धर्म, मोक्षसमाज को अपना अनुभव लौटाना, अगली पीढ़ी का मार्गदर्शन, और आत्मचिंतन आरम्भ करना।
संन्यास (विरक्ति)मोक्षसभी भौतिक दायित्वों से मुक्त होकर पूर्णतः आत्मज्ञान और सत्य की खोज में लीन होना।

कई बार धर्म और अर्थ, अर्थ और काम, या काम और मोक्ष के बीच संघर्ष उत्पन्न होता है। उदाहरण के लिए, यदि धन (अर्थ) का अर्जन धर्म के विरुद्ध हो, तो वह समाज और व्यक्ति दोनों के लिए हानिकारक है। इसी प्रकार, यदि इच्छाओं (काम) की पूर्ति धर्म और अर्थ के बिना हो, तो वह पतन का कारण बनती है। समाधान यही है कि धर्म को सर्वोच्च मानकर, अर्थ और काम का संतुलित और नैतिक उपयोग किया जाए, और अंततः मोक्ष की ओर अग्रसर हुआ जाए।


आधुनिक जीवन में पुरुषार्थ का संतुलन


आज के समय में अवसाद (Depression) और तनाव का सबसे बड़ा कारण इन चार पुरुषार्थों के बीच का असंतुलन है। जब व्यक्ति 'धर्म' (Ethics/Duty) की परवाह किए बिना 'अर्थ' (Wealth) कमाने दौड़ता है, तो वह समाज के लिए भ्रष्ट और स्वयं के लिए अशांत हो जाता है। इसी प्रकार, जब 'अर्थ' के बिना 'काम' (Desires) की ओर अंधाधुंध भागा जाता है, तो वह पतन का कारण बनता है॥

महाभारत के अंत में महर्षि वेदव्यास ने अत्यंत पीड़ा के साथ यही बात कही थी कि लोग धर्म को छोड़कर अर्थ और काम के पीछे क्यों भागते हैं, जबकि अर्थ और काम की स्थायी प्राप्ति 'धर्म' से ही संभव है -


ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे। मैं दोनों भुजाएँ उठाकर पुकार रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते॥ धर्म से ही अर्थ (धन) और काम (सुख) की प्राप्ति होती है, तो उस धर्म का सेवन क्यों नहीं किया जाता? — (महाभारत, स्वर्गारोहण पर्व 5.62)


समाधान यही है कि धर्म को नींव (Foundation) बनाया जाए, मोक्ष को अंतिम लक्ष्य (Ultimate Vision) रखा जाए, और इस नींव व लक्ष्य के बीच अर्थ और काम की दीवारों को संतुलित रूप से चुना जाए। यही पुरुषार्थ चतुष्टय का वास्तविक मर्म है और एक सफल, शांत व पूर्ण जीवन जीने का वैदिक सूत्र है॥


आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम प्रायः सफल तो होते हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं। इसका कारण है हमारे जीवन में 'पुरुषार्थ' के संतुलन का अभाव। प्राचीन भारतीय दर्शन के ये चार स्तंभ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—सिर्फ आध्यात्मिक शब्द नहीं, अपितु एक उन्नत जीवन जीने की 'चेकलिस्ट' हैं। चलो जो-जो हमने पढ़ा अब तक उसे जोड़कर एकरूपता देते हैं॥


पुरुषार्थमूल सिद्धांत (Key Principles)क्रियात्मक स्वरूप (Modern Practice)अंतिम साध्य (Final Goal)
धर्मऋत (संतुलन) और सत (सत्यता)मन, वाणी और कर्म में एकरूपता रखना, लोकहित को प्राथमिकता देनाऋतस्य गोपा और न्यायपूर्ण जीवन
अर्थअनागतविधाता, प्रति-उत्पन्न-मति, यद्भविष्यकौशल संवर्धन (षड् गुण) अपना कर कुसूलधान्यक बनने और उसकी रक्षा करनायोगक्षेम और सामाजिक उत्थान
कामसत-असत (नित्य-अनित्य, श्रेय-प्रेय, भूमा-वामा) का बोधकर्म में प्रेम रखना, लेकिन फल से आसक्ति (Attachment) का त्याग करनाआप्तकाम और रसमय जीवन
मोक्षस्थितप्रज्ञ और दृष्टा भावमृत्यु की शाश्वतता और भाग्य की स्वीकार्यता के साथ कर्म करनास्वच्छंद जीवन और परम शांति

इन्हे जीवन में धारण करने के लिए कुछ उपयोगी प्रश्नों को सूचीबद्ध करें ये आपको जीवन में कभी भी क्या करना है उसका आधार देगी।


पुरुषार्थआत्म-मंथन के लिए प्रश्न (Diagnostic Questions)
धर्मक्या मेरा कार्य मेरे नैसर्गिक स्वभाव से मेल खाता है?
क्या यह समाज के काम आ रहा है?
अर्थक्या मेरा काम परिवार के लिए आजीविका का साधन है
क्या मुझे कुसूलधान्यक और व्यापारी बनने में सहायता करता है?
कामक्या मुझे अपने कर्म से प्रेम है?
क्या मेरा प्रतिफल (Output) श्रेय, नित्य और भूमा है?
मोक्षक्या मेरा कर्म मुझे सामाजिक और मानसिक मुक्ति देता है?
क्या मेरा कर्म मुझे शांति, स्वच्छंदता, स्वायत्तता दे रहा है ?

जीवन की सार्थकता इन चारों के संतुलन में है। यदि अर्थ और काम, धर्म की मर्यादा में रहकर किए जाएं, तो मोक्ष का द्वार स्वयं ही खुल जाता है। आज ही इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए एक सूची बनाएँ और देखें कि कौन सा काम कितने अंक प्राप्त करता है॥


कर्म की पूर्णता: (समय, स्वभाव और संकल्प का संगम)


कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। इस संसार में अपने (स्वभाव और आश्रम के अनुरूप) कर्तव्य-कर्मों को करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ इस प्रकार (अनासक्त भाव से) कर्म करने पर मनुष्य कर्मों में लिप्त नहीं होता (अर्थात उसे मोक्ष व स्वाधीनता प्राप्त होती है), इसके सिवा मुक्ति का और कोई मार्ग नहीं है। — (ईशावास्योपनिषद, मंत्र 2)


अब आप इसे वर्णाश्रम से भी जोड़ दो तो एक समग्र कर्म की सरंचना उभर कर आती है। जीवन का अर्थ केवल भागना नहीं, अपितु एक 'लय' (Rhythm) में चलना है। जब हम आश्रम, वर्ण और पुरुषार्थ को एक साथ जोड़कर देखते हैं, तब हमारे कर्म में वह पूर्णता आती है जो साधारण प्रयासों को 'योग' बना देती है। यह एक त्रि-आयामी (3D) फ्रेमवर्क है जो आपकी प्रगति को सुनिश्चित करता है॥


जो कहती है कि पहले ये देखो आप जीवन के कौन से पड़ाव पर हो। आपकी आयु क्या है। उसके अनुसार कर्म और आचरण चुनो। आश्रम हमें यह सिखाता है कि 'कब क्या करना' अनिवार्य है।


  1. ब्रह्मचर्य (शिक्षा चरण - learning phase) - आपको एक आयु में सीखना चाहिए। परंतु सीखना जीवन प्रयंत चलता रहना चाहिए था।
  2. गृहस्थ (अर्जन चरण - earning phase) - अब जो सीख लिया उसे संसार के कार्य में लगाओ। 80% कार्य इसी आश्रम में ही पूर्ण होते हैं।
  3. वानप्रस्थ (वितरण चरण - delegation phase) - अब किसी और को भी अपना संचय किया धन और ज्ञान बाँटना चाहिए।
  4. संन्यास (विश्राम चरण - resignation phase) - अहम् को त्याग कर पूर्ण शांति में विलीन होना।

एक बार जब आप अपना पड़ाव समझ लेते हैं, तो अपनी आंतरिक पुकार को सुनें। आप ये देखो कि प्राप्तव्य के योग्य केवल 3 वस्तुएँ हैं। श्री, शक्ति और सरस्वती आप इनमें से किसे अधिक महत्व देते हैं॥


  1. श्री (वैश्य) - क्या आपकी बुद्धि संसाधन निर्माण, व्यापार और संवर्धन में रमती है? एंटरप्रेन्योर्स, इन्वेस्टर्स, वेल्थ क्रिएटर्स आपके लिए उचित मार्ग हैं॥
  2. शक्ति (क्षत्रिय) - क्या आपके भीतर न्याय, रक्षा, नेतृत्व और व्यवस्था की आग है? मैनेजर्स, लीडर्स, एडमिनिस्ट्रेटर्स आपके लिए उचित मार्ग हैं॥
  3. सरस्वती (ब्राह्मण) - क्या आप ज्ञान, शोध और अभिव्यक्ति के साधक हैं? कंसल्टेंट्स, स्कॉलर्स, क्रिएटिव्स आपके लिए उचित मार्ग हैं॥

आप किस दिशा में बढ़ना चाहेंगे ये आप सुनिश्चित करें। और उसी दिशा में ध्यान लगाएँ। यद्यपि तीनों पूर्णतः पृथक-पृथक तो नहीं है। उनका समावेश कहीं ना कहीं चलता ही रहता है। अपनी प्राथमिकता तय करें, क्योंकि जो हर दिशा में जाना चाहता है, वह कहीं नहीं पहुँचता॥

अब वहाँ पहुँचने के लिए जो-जो मार्ग आपके पास हैं उसे पुरुषार्थ कि कसौटी पर परखो ताकि आप अपने लिए एक सर्वोत्तम मार्ग चुन पाओ। यह आपकी 'क्वालिटी चेक' (Quality Check) प्रक्रिया है -


  1. धर्म - क्या यह मार्ग मेरे नैसर्गिक स्वभाव से मेल खाता है और क्या ये लोकहित में है?
  2. अर्थ - क्या यह मुझे संसाधनों से सशक्त कर रहा है?
  3. काम - क्या ये मुझे प्रिय है, क्या यह मुझे आनंद दे रहा है?
  4. मोक्ष - क्या यह मुझे समय, स्थान और निर्णय लेने की 'स्वाधीनता' और 'स्वच्छंदता' प्रदान कर रहा है?

यदि आप ये प्रक्रिया जीवन में उचित समय में सीख लेते हो तो आपके जीवन को एक ऐसी गति देगी की आप शीर्ष शिखर पर पहुँचे बिना नहीं रह पाओगे॥


जीवन का आयाम (Dimension)आत्म-मंथन का प्रश्न (Introspective Question)परिणाम (Outcome & Purpose)
१. आश्रम (समय का बोध)मेरी वर्तमान आयु और पड़ाव क्या है? (सीखना, अर्जन, वितरण या विश्राम)प्रासंगिकता (Context): कर्म करने का उचित समय और व्यवहार।
२. वर्ण (स्वभाव का बोध)मेरी आंतरिक पुकार और प्राथमिकता क्या है? (श्री, शक्ति या सरस्वती)दिशा (Orientation): ऊर्जा को एक स्पष्ट लक्ष्य की ओर लगाना।
३. पुरुषार्थ (कर्म की कसौटी)क्या यह मार्ग मुझे नैतिक रूप से समृद्ध, आनंदित और स्वाधीन (Liberated) कर रहा है?सार्थकता (Validation): कर्म की गुणवत्ता की जाँच और अंतिम सफलता।

आशा करता हूँ ये आपके जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त करेगा॥