॥ वैदिक जीवन ॥


॥ पुरुषार्थ (अर्थ) ॥

पुरुषार्थ की दृष्टि से अर्थ की व्याख्या और अर्थार्जन के सूत्र॥


नानाश्रान्ताय श्रीरस्ति इति रोहित शुश्रुम। हे रोहित! हमने सुना है कि जो बिना थके श्रम करता है, श्री (लक्ष्मी) उसी को प्राप्त होती है। पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा॥ आलस्य में बैठा व्यक्ति पाप के समान है, इंद्र भी उसी का मित्र बनता है जो निरंतर गतिशील रहता है॥ चरैवेति, चरैवेति॥ इसलिए चलते रहो, चलते रहो॥ आस्ते भग आसीनस्य ऊर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः। जो बैठा रहता है, उसका भाग्य भी बैठ जाता है, जो खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी खड़ा (जाग्रत) हो जाता है। शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगः॥ जो सो जाता है, उसका भाग्य भी सो जाता है, किन्तु जो निरंतर चलता (प्रयत्न करता) रहता है, उसका भाग्य भी चलने लगता है॥ चरैवेति, चरैवेति॥ इसलिए, चलते रहो, चलते रहो (निरंतर आगे बढ़ते रहो)॥ चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्। चलने वाला ही (श्रम रूपी) शहद प्राप्त करता है और चलने वाला ही श्रेष्ठ स्वादिष्ट फल पाता है। सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन्॥ सूर्य की तपस्या और श्रेष्ठता को देखो, जो कभी प्रमाद (आलस्य) नहीं करता और निरंतर चलता रहता है॥ चरैवेति, चरैवेति॥ चलते रहो, चलते रहो॥ — ऐतरेय ब्राह्मण (33.3)




॥ पुरुषार्थ (अर्थ) ॥


अर्थ (संसाधन, धन, जीविका)


अर्थः नाम धान्य‑धन‑पशु‑भूमि‑मित्रादीनाम् उपार्जन‑रक्षण‑वृद्धिः॥ धान्य (अनाज), धन, पशु, भूमि और मित्रों का अर्जन करना, उनका रक्षण करना और उनमें वृद्धि करना ही 'अर्थ' है॥ — कामसूत्र (१.२.९)


अर्थ का सामान्य अर्थ धन या संपत्ति है, किंतु शास्त्रीय दृष्टि में यह जीवन की सभी भौतिक आवश्यकताओं — अन्न, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, व्यापार, राज्य व्यवस्था — की पूर्ति से संबंधित है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अर्थ को "मनुष्यों की जीविका" कहा गया है। भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बिना कोई भी समाज या व्यक्ति स्थायित्व, सुरक्षा और विकास नहीं पा सकता। विद्या, भूमि, स्वर्ण, पशु, धान्य, पात्र, उपकरण और मित्रों का अर्जन करना तथा जो अर्जित है उसे बढ़ाना ही 'अर्थ' है॥


उपरोक्त श्लोक जो हमने पढ़े वह ऐत्रेय ब्राह्मण के श्लोक हैं, जो अर्थार्जन के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र है। जिनका अर्थ है "चलते रहो, चलते रहो"। यह हमें निरंतर प्रयास करने और हार न मानने की प्रेरणा देता है। अर्थार्जन में विघ्न और बाधाएँ आएंगी, लेकिन हमें निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। यह सूत्र हमें यह भी सिखाता है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता, अपितु यह एक सतत प्रक्रिया है। अर्थसिद्धि के लिए भाग्य और पुरुषार्थ का संतुलन अनिवार्य है। कछुए और खरगोश की दौड़ नामक कथा भी हमें यही सिखाती है कि निरंतरता और धैर्य से ही सफलता मिलती हैं। चाणक्य नीति में भी इसे इस श्लोक के माध्यम से समझाया गया है॥


जलविन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। जैसे पानी की एक-एक बूंद गिरने से धीरे-धीरे घड़ा भर जाता है। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥ यही नियम सभी विद्याओं, धर्म और धन के संचय पर भी लागू होता है (अर्थात निरंतर प्रयास से ही ये तीनों सिद्ध होते हैं)॥ — चाणक्य नीति (तथा हितोपदेश)


मेरी माँ मुझे बचपन में सिखाती थी कि काम करते समय हमेशा बड़े व्यक्ति (धनी, सफल) को देखो की वो कैसे काम करता है, क्यूँ उसे उसी समय में अधिक धन अर्जित करने को मिलता है। और व्यय करते समय ये देखो की छोटे व्यक्ति (गरीब, असफल) को कैसे खर्च करने को मिलता है। ये दोनो यदि तुम निरंतर करोगे तो तुम्हे पैसा बचाने में सफलता मिलेगी। वो बचा हुआ पैसा ही असली धन है। इससे तुम्हे अर्थार्जन के लिए प्रेरणा मिलेगी की मुझसे भी ऊपर और भी कई लोग हैं जो अधिक सफल हैं या अधिक धन, बल, बुद्धि, बंधु अथवा मन के स्वामी हैं। और व्यय करते समय एक संतोष मिलेगा की मैं किसी से तो अच्छा ही खा लगा रहा हूँ। इस प्रकार तुम जी तोड़ कर्म भी करोगे और फल पर भी आसक्त नहीं रहोगे। ये बात शास्त्रिय नहीं है, इसका कोई श्लोक अथवा प्रमाण नहीं है, परंतु मेरे लिए ये गीता का सार है। क्यूँकि स्वयं मेरी माँ ने बारम्बार मुझे ये बात सिखाई॥


अर्थार्जन में परिश्रम और भाग्य दोनो का मेल तो है परंतु भाग्य का अधिक भाग है। तो जब आपके पास अर्थ हो तो उसे व्यर्थ ना करें, बूँद-बूँद जोड़ते रहें और जीवन में जब भी आपका बुरा समय आएगा जो कि आएगा ही आएगा तो उस समय ये जुड़ा हुआ अर्थ आपको बचाएगा। और ये एक सतत प्रक्रिया कि भाँति बार-बार बार-बार करते रहना हैं। वो जुड़ा हुई आय ही धन बनेगी और वो जुड़ा हुआ धन ही सम्पत्ति बनेगा॥


कुसूलधान्यको वा स्यात्कुम्भीधान्यक एव वा।
गृहस्थ ऐसा हो सकता है जो अन्न को कोठार में रखता हो या घड़े में संग्रह करता हो।

त्र्यहैहिको वापि भवेदश्वस्तनिक एव वा॥
या वह तीन दिन का भंडार रखता हो अथवा केवल अगले दिन का अन्न ही संचित करता हो।

— मनुस्मृति (अध्याय ४, श्लोक ७)


नीतिशास्त्र इन्हे इस तरह से विभाजित करता है। यहाँ ये स्मरणयोग्य बात है कि यहाँ उपभोग के आधार पर व्यक्ति को निर्धन अथवा धनी बताया गया है। ये आजकल की क्रेडिट कार्ड, लोन और ई॰एम॰आई॰ पर जीने वाली पीड़ी के लिए एक बड़ी सीख है॥

  1. कुसूलधान्यक - जिसके पास 3 वर्ष तक के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त धन हो॥
  2. कुम्भीधान्यक - जिसके पास 1 वर्ष के लिए धन का संचय हो॥
  3. त्र्यहैहिक - जिसके पास केवल 3 दिन की आवश्यकता पूर्ति हेतु संचय हो॥
  4. अश्वस्तनिक - जिसके पास कल के लिए कुछ भी संचित न हो॥

अर्थार्जन के सूत्र


अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा।
अनागतविधाता (जो आने वाले संकट को पहले ही जान ले) और प्रत्युत्पन्नमति (जिसकी बुद्धि संकट आने पर तुरंत समाधान खोज ले)।

द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥
ये दोनों सुखपूर्वक जीवन जीते हैं और प्रगति करते हैं। जबकि 'यद्भविष्य' (जो केवल भाग्य के भरोसे बैठा रहता है) का विनाश निश्चित है॥

— पंचतंत्र (तन्त्र-१, मित्रभेद)


पहले एक कथा की बात करते हैं। किसी जलाशय में तीन मछलियाँ रहती थीं। उनके स्वभाव के अनुरूप ही उनके नाम थे— अनागतविधाता, प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य (भाग्यविधाता)। एक शाम कुछ मछुआरे उस जलाशय के पास से गुजरे। जलाशय में मछलियों की भरमार देखकर वे आपस में कहने लगे, "इस तालाब में तो बहुत मछलियाँ हैं, हमने पहले इसे कभी नहीं देखा। आज तो समय हो गया है, कल सुबह यहाँ जाल डालेंगे।"


मछआरों की बात सुनकर तीनों मछलियों ने सभा की।


  1. अनागतविधाता (जिसने संकट आने से पहले ही सोच लिया) बोली — "मछआरों की बातें सुनकर साफ़ है कि कल यहाँ मृत्यु का जाल बिछेगा। बुद्धिमान वही है जो संकट आने से पहले ही अपनी सुरक्षा का प्रबंध कर ले। मैं तो अभी इसी क्षण इस छोटी नहर के रास्ते दूसरे बड़े जलाशय में जा रही हूँ।" और वह तुरंत वहां से निकल गई।

चिन्तनीया हि विपदां आदावेव प्रतिक्रिया।
विपत्ति आने से पहले ही उसके प्रतिकार (समाधान) के बारे में सोच लेना चाहिए।

न कूपखननं युक्तं प्रदीप्ते वह्निना गृहे ॥
जब घर में आग लग जाए, तब कुआँ खोदना उचित नहीं होता॥

— पञ्चतन्त्र / हितोपदेश


  1. प्रत्युत्पन्नमति (जिसकी बुद्धि संकट के समय तुरंत निर्णय लेती है) बोली — "भविष्य की अनिश्चितता के लिए अपना घर छोड़ना ठीक नहीं। जब संकट सामने आएगा, तब अपनी बुद्धि के बल पर कोई रास्ता निकाल लूँगी।"

बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।
जिसके पास बुद्धि है, वास्तव में बल भी उसी के पास है, बुद्धिहीन के पास बल कहाँ?

पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥
देखो, एक छोटे से खरगोश ने अपनी बुद्धि से मदमस्त सिंह को भी मार गिराया था॥

— पञ्चतन्त्र


  1. यद्भविष्य (जो भाग्य के भरोसे था) हंसकर बोला — "भागने से क्या होगा? अगर मौत भाग्य में लिखी है, तो कहीं भी आ जाएगी। जो होना है, वो होकर रहेगा, चिंता क्यों करें?"

उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः,
जो उद्योगी (परिश्रमी) है और पुरुषार्थी पुरुषों में सिंह के समान श्रेष्ठ है, लक्ष्मी (सम्पत्ति) स्वयं उसके पास आती है।

दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।
"भाग्य से ही सब मिलेगा", ऐसा केवल कायर लोग कहते हैं।

दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या,
इसलिए भाग्य की बात छोड़कर अपनी पूरी शक्ति से पुरुषार्थ करो।

यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥
यदि प्रयास करने के बाद भी सफलता न मिले, तो यह देखना चाहिए कि त्रुटि कहाँ रह गई (अर्थात् प्रयास में अभाव था या दिशा में)॥

— हितोपदेश, प्रस्ताविका (श्लोक ३१)


अगले दिन मछुआरे आए और जाल फैला दिया। प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य दोनों जाल में फँस गईं। प्रत्युत्पन्नमति ने तुरंत अपनी बुद्धि का प्रयोग किया और एक मृत मछली की तरह शरीर को फुलाकर निश्चल पड़ गई। मछुआरे ने उसे मरा हुआ समझकर जाल से बाहर जमीन पर फेंक दिया। मौका पाते ही वह फुर्ती से उछली और गहरे पानी में सुरक्षित चली गई। वहीं यद्भविष्य भाग्य के भरोसे जाल में छटपटाता रहा और अंततः मछुआरों द्वारा पकड़ लिया गया और मारा गया॥


अर्थार्जन के लिए एक प्रमुख सूत्र मैं यहां लिख रहा हूँ, जो शास्त्रों में दिया गया है। अच्छा ऐसे कई कई सूत्र हैं, परंतु मैं वो सूत्र दे रहा हूँ जो मुझे सबसे सार्थक लगा। अधिकता केवल भ्रम पैदा करती है। जीवन में किसी एक वाक्य को आत्मसात करने में ही जीवन निकल जाता है। मेरा सूत्र भी सुनने में सरल किंतु प्रयोग में कठिन लगेगा। यह कहानी हमें अर्थार्जन के तीन प्रमुख गुण सिखाती है (अर्थार्जन के तीन स्तंभ)॥


1. अनागतविधाता (Visionary और Forecasting)


जो व्यक्ति बाज़ार की लहरों को पहले ही भाँप ले और जान जाए कि भविष्य में क्या होने वाला है, उसे धनी बनने से कोई नहीं रोक सकता। यह 'Forethought' का गुण है जो उसे दूसरों से आगे रखता है। अनागतविधाता का अर्थ केवल "आने वाले कल के बारे में सोचना" नहीं है, अपितु 'Asymmetry' (असंतुलन) को पहचानना है। अर्थशास्त्र की भाषा में, जब आप बाज़ार में होने वाले किसी बड़े बदलाव को बाकियों से पहले देख लेते हैं, तो आप 'First Mover Advantage' प्राप्त करते हैं॥


जिस प्रकार गरुड़ और चील अपने भक्ष्य के ऊपर झपटने के लिए वहाँ लक्ष्य बनाती है जहाँ भक्ष्य पहुँचने वाला हो ना कि जहाँ वो अभी है। शत्रु की चाल भापना और प्रतिघात करना एक सफल क्षत्रिय का परिचय है। इसी गुण से व्यक्ति युद्ध जीत सकता है। धंधा बना सकता है। राज्य चला सकता है। वह कुछ भी कर सकता है। ये गुण अर्थार्जन की दृष्टि में सबसे उच्चतम गुण हैं॥


2. प्रत्युत्पन्नमति (Hustler Mentality और Adaptability)


प्रत्युत्पन्नमति वह 'Hustler' है जो योजना के विफल होने पर शोक नहीं मनाता, अपितु तुरंत 'Pivot' (दिशा परिवर्तन) करता है। व्यापार और करियर में प्रायः पहली योजना सफल नहीं होती। यहाँ 'Agility' ही आपकी सबसे बड़ी संपत्ति है। जो व्यक्ति समस्याओं से जूझना जानता है और समय की माँग के अनुसार लचीला (Flexible) होकर अपनी रणनीति बदल लेता है, वह भी धनी बनेगा, भले ही इसमें थोड़ा समय अधिक लगे॥


वह हार नहीं मानता, अपितु "अब यहाँ से श्रेष्ठ क्या हो सकता है?" इस पर ध्यान देता है। हसलर मेंटालिटी का अर्थ केवल कड़ी मेहनत नहीं, अपितु 'स्मार्ट रिस्पांस' है। हम सब अपूर्ण है और पूर्ण इस धरा पर कुछ भी नहीं तो जो जैसा है, जितना है उसका सदुपयोग करके उससे लाभ उठाना ही प्रत्युत्पन्नमति है। आज की भाषा में हम ऐसे व्यक्ति को जो हर कार्य में युक्तियाँ प्रयोग करता हो 'जुगाड़ू' कहते हैं। और ये एक महत्वपूर्ण कौशल है अर्थार्जन का॥


3. यद्भविष्य (Potential & Waiting):


अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते
जो भक्त अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
उन नित्य संलग्न भक्तों का योग (आवश्यक वस्तु की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा) मैं स्वयं करता हूँ।

— श्रीमद्भगवद्गीता (९.२२)


वह व्यक्ति जिसमें अर्थार्जन के मूल गुण तो हैं, लेकिन वह पूरी तरह से पुरुषार्थ और सही समय के तालमेल पर टिका है। ऐसे व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए प्रायः भाग्य (Timing) के प्रबल सहारे की आवश्यकता होती है॥


धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥ — कबीर दास


पुरानी कथा में यद्भविष्य को बहुत ही बेकार रूप में दिखाया गया है। परंतु अर्थार्जन में धृति, तितिक्षा और तप का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। एक बार एक व्यक्ति एक समुद्र को तैर के पार करना चाहता था। वो रामसेतु से श्रीलंका तक तैर के जाना चाहता था। उसने कई वर्षों तक अभ्यास किया परंतु अंततः वह जब किनारे से तैरने लगा तो 16 कोस बाद थक कर वापस उसी किनारे आ गया जहाँ से निकला था। कई वर्षों बाद उसे पता चला की पूरी दूरी मात्र 30 कोस थी यदि वह हार कर वापस नहीं आता तो वह तैर के पार हो जाता। इसलिए किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पहले ही हार मान लेना या बीच में ही छोड़ देना सबसे बड़ा पाप है॥


ऐसी ही एक कथा चीन में भी प्रचलित है। चीन में एक कथा बड़ी प्रचलित है की एक किसान था वो चीनी बाँस (Moso Bamboo) उगाना चाहता था। उसने 5 वर्ष तक बाँस के बीजो को दिन में दो बार नदी से पानी ढ़ो कर दिया। परंतु उनमें से कुछ नहीं निकला। पुरा गाँव उसका उपहास करता की यदि बाँस को उगना होता तो वो उग जाते बीज मर चुका है या धरती बंजर है इत्यादि। किंतु किसान को अपने बीज पर विश्वास था। अचानक एक घटना घटी 2 मास में ही बाँस का पेड़ 100 पग उग आया। सारा गाँव उसे कहता की तुम्हारा भाग्य बड़ा अच्छा है, 2 मास में कोई बाँस उगता है भला। परंतु किसान उन्हे कहता की ये 2 मास में नहीं 5 वर्ष 2 मास में उगा है। उन 5 वर्षों में बाँस ऊपर नहीं बढ़ रहा था, अपितु अपनी जड़ें इतनी गहरी और मजबूत कर रहा था कि जब वह 100 पग बढ़े, तो उस भार को सह सके। अर्थार्जन में भी 'कौशल' (Skills) का विकास वही अदृश्य जड़ें हैं॥


ये कथा हमें बताती है कि हर वस्तु का अपना समय होता है और बिना ऋतु के फल नहीं होते। व्यक्ति को धृति का गुण धारण करना चाहिए। लक्ष्य कभी कभार बिल्कुल निकट होता है पर व्यक्ति पहले ही हार मान लेता है। कष्टों से मुख ना मोड़ना और तितिक्षा को अपना मित्र समझना चाहिए। साथ ही तप का फल अवश्य मिलता है। अर्थात धृति, तितिक्षा और तप सफल मनुष्य के परममित्र हैं॥


प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः, विघ्न-बाधाओं के डर से नीच (अधम) श्रेणी के लोग किसी कार्य को आरम्भ ही नहीं करते।, प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः। मध्यम श्रेणी के लोग कार्य आरम्भ तो कर देते हैं, किन्तु मार्ग में बाधाएँ आने पर उसे बीच में ही छोड़ देते हैं। विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः, किन्तु उत्तम श्रेणी के व्यक्ति बार-बार विघ्न आने पर भी, प्रारब्धमुत्तमजना न परित्यजन्ति (अर्थं न परित्यजन्ति)॥ आरम्भ किए गए कार्य को पूर्ण किए बिना नहीं छोड़ते॥

— नीतिशतकम्


व्यक्ति को धैर्य और संयम से अपने कर्म में निरंतरता बनाए रखनी चाहिए। और आस्था रखनी चाहिए की तप का फल अवश्य मिलेगा। धृति, तितिक्षा और तप सफल मनुष्य के परममित्र हैं। जो व्यक्ति किसी भी कार्य को अधुरा नहीं छोड़ता उसे सफलता निश्चित ही मिलती है। क्यूँकि एक के बाद एक कार्य करते करते कोई ना कोई तो अवश्य सफल हो ही जाता है॥


4. अर्थार्जन के गुण और अवगुणः


अर्थार्जन (Wealth Creation) केवल गणितीय गणनाओं या बाज़ार के उतार-चढ़ाव का खेल नहीं है, अपितु यह एक सूक्ष्म मानसिक साधना है। हमारे शास्त्रों में धन को 'लक्ष्मी' कहा गया है, जो चंचल है, और उसे स्थिर करने के लिए व्यक्ति के भीतर विशिष्ट गुणों का होना अनिवार्य है। इस लेख को लिखने का मेरा भाव उन प्राचीन वैज्ञानिक सूत्रों को उजागर करना है, जो आज के आधुनिक कॉर्पोरेट और उद्यमिता के युग में भी उतने ही सटीक बैठते हैं। अर्थार्जन की इस यात्रा में सफल होने के लिए हमें केवल यह नहीं जानना कि क्या 'करना' है, अपितु यह भी समझना होगा कि किन प्रवृत्तियों को 'छोड़ना' है। आइए, हितोपदेश और विदुर नीति के प्रकाश में उन गुणों और दोषों का विश्लेषण करें जो हमारे वित्तीय जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं॥


अर्थार्जन के ६ स्तंभ: दैवीय गुणों का मनोविज्ञान


जब हम कहते हैं कि "देवता (भाग्य) वहां प्रसन्न होते हैं", तो इसका दार्शनिक अर्थ यह है कि ये छह गुण मिलकर एक ऐसी 'ऊर्जा' उत्पन्न करते हैं जो सफलता को चुम्बक की तरह खींचती है॥


उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। उद्यम (परिश्रम), साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम

षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवात् प्रसीदति ॥ ये छह गुण जिस व्यक्ति में होते हैं, वहाँ देवता (या भाग्य) भी सहायता के लिए प्रसन्न रहते हैं॥

— हितोपदेश (तथा सुभाषितरत्नभाण्डागारम्)


  1. उद्यम (Effort) - वह संकल्प जो विचार को क्रिया में बदलता है, क्योंकि बिना प्रयास के कोई भी संभावना परिणाम में नहीं बदल सकती॥

  1. बुद्धि (Intellect) - दिशा दिखाने वाला वह यंत्र जो बताता है कि ऊर्जा कहाँ लगानी है, ताकि परिश्रम केवल व्यर्थ की बर्बादी न बने॥

  1. शक्ति (Stamina) - मानसिक और शारीरिक दृढ़ता, जो बड़े लक्ष्यों की लंबी दौड़ में आपको 'फिनिश लाइन' तक पहुँचने का सामर्थ्य देती है॥

  1. धैर्य (Patience) - समय के साथ 'कंपाउंडिंग' का लाभ लेने की क्षमता, क्योंकि सही अवसर की प्रतीक्षा करना ही सबसे बड़ा निवेश है॥

  1. साहस (Risk) - अनिश्चितता के बीच कदम बढ़ाने की हिम्मत, क्योंकि जोखिम से डरने वाला व्यक्ति केवल बचत कर सकता है, सृजन नहीं॥

  1. पराक्रम (Edge) - असाधारण सामर्थ्य अथवा कौशल जो आपको भीड़ में सबसे श्रेष्ठ बनाता है और बाज़ार में आपकी सफलता की धाक जमाता है॥

अर्थ का नाश करने वाले ६ छिद्र: पतन का दर्शन


षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता। ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले मनुष्य को इन छह दोषों का त्याग कर देना चाहिए

निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ अधिक निद्रा (नींद), ऊँघना (तन्द्रा), डर, क्रोध, आलस्य और काम को टालने की आदत (दीर्घसूत्रता)॥

— विदुर नीति (महाभारत)


विदुर नीति के ये ६ दोष वास्तव में 'Value Erosion' के कारक हैं। ये वे सूक्ष्म दीमक हैं जो कुबेर के खजाने को भी खोखला कर देते हैं।


  1. निद्रा (Time Waste) - आवश्यकता से अधिक नींद और समय का अपव्यय, जो आपको बाज़ार की गतिविधियों और अवसरों से पूरी तरह काट देता है॥

  1. तन्द्रा (Sluggishness) - वह सुस्ती या मानसिक ऊँघ जिसके कारण सामने खड़ा अवसर भी हाथ से निकल जाता है और काम में अनावश्यक देरी होती है॥

  1. आलस्य (Laziness) - सक्रिय पूँजी और कौशल को जड़ बना देने वाला दोष, जो उन्नति के मार्ग को पूरी तरह अवरुद्ध कर देता है॥

  1. दीर्घसूत्रता (Procrastination) - छोटे से कार्य को भी कल पर टालने की आदत, जो समय की प्रतिस्पर्धा में आपके लाभ को समाप्त कर देती है॥

  1. भय (Fear) - निर्णय लेने की अक्षमता और जोखिम से डर, जो व्यक्ति को कभी विस्तार नहीं करने देता और यथास्थिति में कैद रखता है॥

  1. क्रोध (Loss of Logic) - विवेक को नष्ट करने वाला वह आवेग, जिसके कारण आवेश में लिए गए गलत निर्णय वर्षों की साख और कमाई डुबो देते हैं॥

अर्थार्जन का यह पूर्ण दर्शन हमें सिखाता है कि सफलता संयोग नहीं, अपितु एक सुनियोजित ऊर्जा का परिणाम है। जहाँ उद्यम, साहस और बुद्धि जैसे ६ स्तंभ हमारे आर्थिक साम्राज्य की नींव रखते हैं, वहीं निद्रा और दीर्घसूत्रता जैसे ६ दोष उस नींव को भीतर ही भीतर खोखला कर देते हैं। इन सूत्रों का उपयोग केवल पढ़ने के लिए नहीं, अपितु आत्म-निरीक्षण के लिए है। यदि आप जीवन में निरंतर प्रगति और स्थायी समृद्धि चाहते हैं, तो इन गुणों को अपने आचरण में उतारें और इन दोषों को अपने समय और संकल्प से बाहर निकालें। अंततः, लक्ष्मी वहीं ठहरती है जहाँ पुरुषार्थ का सिंह गर्जना करता है और प्रमाद का अंधकार समाप्त होता है। धृति, तितिक्षा और निरंतर कर्म ही आपके दरिद्रता से ऐश्वर्य तक के मार्ग को प्रशस्त करेंगे॥


5. अर्थार्जन के शाश्वत मार्ग


भिक्षां नृपत्वं कृषिं च विद्यां वणिजं च।
भिक्षा (दान/साधु जीवन), नृपत्व (राज्य), कृषि (खेती), विद्या (ज्ञान) और वणिज्य (व्यापार)।

ऋणप्रदानं च सहायार्थं अर्थस्य हेतवः॥
ऋण देना और दूसरों की सहायता करना—ये सब अर्थ (धन) प्राप्ति के साधन हैं।

— पञ्चतन्त्र मित्रभेद (तन्त्र‑१)


हजारों वर्ष पूर्व पंचतंत्र में धन कमाने के केवल छह मार्गों का उल्लेख किया गया था— भिक्षा, राजसेवा, कृषि, विद्या, वाणिज्य और लेनदेन। आज हम भले ही एआई (AI) और ट्रिलियन-डॉलर इकॉनमी के युग में जी रहे हों, लेकिन अगर आप गहराई से देखें, तो संसार का कोई भी प्रोफेशन या व्यापार इन छह श्रेणियों से बाहर नहीं है। सच तो यह है कि हमने नई अर्थव्यवस्थाएँ नहीं बनाई हैं, अपितु केवल इन प्राचीन शब्दों को नए और आकर्षक अंग्रेजी नाम दे दिए हैं।


  1. भिक्षा - आज इसका स्वरूप संस्थागत और बहुत आधुनिक हो गया है। समाज कल्याण के लिए चल रहे एनजीओ (NGOs), क्राउडफंडिंग, और यहाँ तक कि वे आधुनिक स्टार्टअप जो बिना किसी कमाई के केवल निवेशकों के अनुदान (Funding) के भरोसे चल रहे हैं, वे इसी भिक्षा के परिष्कृत रूप हैं, जहाँ धन किसी विचार या सहानुभूति के आधार पर मिलता है॥

  1. कृषि - इसका मूल अर्थ केवल खेत जोतना नहीं, अपितु समाज का 'पोषण' करना है। आज के समय में केवल किसान ही नहीं, अपितु पूरा एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर, हॉस्पिटैलिटी या होटल उद्योग, और दैनिक आवश्यकताओं (कपड़ा, मकान, माचिस इत्यादि) से जुड़ी वस्तुएं बनाने वाली हर कंपनी इसी कृषि का आधुनिक रूप है। जो भी उद्योग हमारी जैविक और पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है, वह कृषि ही है॥

  1. राजसेवा - पहले लोग राजा के दरबार में नौकरी करते थे, आज राजा का स्थान सरकारों और मल्टीनेशनल कंपनियों (MNCs) ने ले लिया है। कोई भी व्यक्ति जो अपनी स्वतंत्रता और समय के बदले किसी बड़े संगठन के अधीन एक निश्चित वेतन पर कार्य कर रहा है, वह आधुनिक राजसेवा में ही है॥

  1. विद्या - प्राचीन काल में ज्ञान देकर धन कमाया जाता था और आज का पूरा 'प्रोफेशनल सेक्टर' यही है। एक डॉक्टर अपनी मेडिकल विद्या, इंजीनियर अपनी तकनीकी समझ, और कोई आईटी प्रोफेशनल अपनी कोडिंग का ज्ञान बेच रहा है। जो भी व्यक्ति अपनी बुद्धि, डिग्री या बौद्धिक कौशल से कमा रहा है, वह विद्यार्जन ही कर रहा है॥

  1. लेनदेन - आज यह दुनिया का सबसे ताकतवर तंत्र बन चुका है। पूरा बैंकिंग सिस्टम, फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, वेंचर कैपिटल, और यहाँ तक कि सट्टा बाजार भी इसी का हिस्सा हैं। यहाँ उत्पाद नहीं बनता केवल एक हाथ से दूसरे हाथ जाता है। जहाँ धन ही धन को खींच रहा हो और जहाँ उत्पाद के नाम पर केवल 'पूंजी का जोखिम' हो, वह सब इसी लेनदेन वृत्ति के अंतर्गत आता है॥

  1. वाणिज्य - आज का व्यापार, धंधा, ई-कॉमर्स, रिटेल चेन, और इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट सब इसी में आते हैं। यहाँ व्यक्ति स्वयं स्वयं जोखिम उठाकर कुछ व्यापार करता है और उससे धन कमाता है। ये सबसे उत्तम मार्ग है अर्थार्जन का।

इन्हे मैंने इनकी ऊपयोगिता के क्रम में ही लगाया है। यदि हम ध्यान दें, तो वास्तविक समाज का निर्माण केवल 'विद्या' और 'कृषि' (ज्ञान और पोषण) से होता है। बाकी के तीन मार्ग (वाणिज्य, लेनदेन, राजसेवा ) केवल इस ज्ञान और पोषण के प्रबंधन के साधन मात्र हैं। और भिक्षा एक Distribution वितरण का स्रोत है जिससे दानी और भिक्षुक मिल जाते है॥


यह सूत्र हर व्यक्ति को यह सोचने पर विवश करता है कि वह अपना जीवन और ऊर्जा इन छह में से किस मार्ग पर लगा रहा है। क्योंकि नीति शास्त्र कहता है कि जिस मार्ग से धन आता है, उसी मार्ग की प्रकृति और उसके गुण-दोष धीरे-धीरे व्यक्ति के स्वभाव और जीवन में भी गहरे उतर जाते हैं। शास्त्र वाणिज्य के धन को सबसे उत्तम मानते हैं और आपको भी व्यापार जमाने का प्रयास जीवन में एक बार तो अवश्य करना ही चाहिए॥


अर्थ की रक्षा


अलब्धमीहेद् धर्मेण, जो प्राप्त नहीं है, उसे धर्मपूर्वक प्राप्त करने की इच्छा (प्रयास) करनी चाहिए, लब्धं यत्नेन पालयेत्। जो प्राप्त हो गया है, उसकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए। पालितं वर्धयेन्नित्यं, रक्षित किए हुए (धन आदि) को निरन्तर बढ़ाना चाहिए, वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत्॥ और बढ़े हुए धन को सुपात्रों (योग्य व्यक्तियों या कार्यों) में लगा देना चाहिए (दान करना चाहिए)॥ — याज्ञवल्क्य-स्मृति (अध्याय 2, श्लोक 176)


अर्थ के लिए चाणक्य ने कहा की "अर्थो रक्षति रक्षितः"। जिसका अर्थ निर्बल है उसका धर्म भी निर्बल होगा उसका काम और मोक्ष भी निर्बल होगा। और बिना धर्म के अर्थ या तो व्यर्थ है या पुर्णतः अनर्थ है। जैसा कि हमने पहले बताया बूँद-बूँद करके अर्थार्जन करना चाहिए। यहाँ इसका अर्थ केवल धन से नहीं परंतु हर प्रकार के लाभ से है। किसी को भूमि चाहिए किसी को संतान किसी को ज्ञान किसी को धान तो हर प्रकार कि वस्तु जिसे पाने के लिए व्यक्ति श्रम करता है वह उसका उद्देश्य अथवा अर्थ है॥


इसलिए मनुष्य को चाहिए की जो नहीं है उसे पाने का प्रयास करे तब जो मिल जाए उसकी रक्षा भी करनी चाहिए। और इसके पश्चात उसकी वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए। और उसका सदुपयोग करना चाहिए। अपनी अर्जित सम्पत्ति ही मनुष्य को कष्टों से बचाती है। और जब बंधु-बांधव, पिता-पुत्र, भार्या-भगिनी कोई भी काम नहीं आता तब भी अपनी सम्पत्ति व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती। इसलिए सम्पत्ति की रक्षा अपनी प्राण देकर भी करनी चाहिए। ये श्लोक व्यक्ति को कभी नहीं भूलना चाहिए॥


न हि लक्ष्मीः कुलक्रमाद् आता, लक्ष्मी (संपदा) न तो कुल की परंपरा (विरासत) से प्राप्त होती है, न हि भूषणम्। और न ही यह कोई दिखावे का आभूषण मात्र है। खड्गेनाक्रम्य भुञ्जीत, अपनी तलवार (शक्ति और उद्यम) के बल पर जिसे जीता जाता है, वीरभोग्या वसुन्धरा॥ वही पृथ्वी अंततः शूर वीरों द्वारा ही भोगी जाती है॥ — चाणक्य-नीति ( सुभाषितरत्नभाण्डागार )


॥ उपसंहार: पुरुषार्थ (अर्थ) ॥


अप्रकटीकृतशक्तिः शक्तोऽपि जनस्तिरस्क्रियां लभते, अपनी शक्ति को प्रकट न करने वाला व्यक्ति, शक्तिशाली होने पर भी तिरस्कार का पात्र बनता है, निवसन्नन्तर्दारुणि लङ्घ्यो वह्निर्न तु ज्वलितः॥ जैसे लकड़ी के भीतर छिपी हुई आग को कोई भी लांघ सकता है, परंतु प्रज्वलित आग के पास जाने का साहस कोई नहीं करता॥ — पंचतंत्र (मित्रभेद, श्लोक 31)


'अर्थ' केवल तिजोरी में बंद धन नहीं, अपितु वह 'गति' है जो व्यक्ति को प्रमाद (आलस्य) से पुरुषार्थ की ओर ले जाती है। ऐतरेय ब्राह्मण का 'चरैवेति' संदेश हमें सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य कभी नहीं थकता, उसी प्रकार जीविका का अर्जन भी एक निरंतर साधना है॥




  • अर्थ की व्यापक परिभाषा - 'अर्थ' केवल भौतिक धन नहीं, अपितु जीवन निर्वाह के सभी साधन—अन्न, भूमि, विद्या, उपकरण और मित्रों का अर्जन, रक्षण व संवर्धन है। यह वह 'गति' है जो मनुष्य को प्रमाद से पुरुषार्थ की ओर ले जाती है।

  • चरैवेति का मूल मंत्र - ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार, लक्ष्मी उसी को प्राप्त होती है जो निरंतर गतिशील रहता है। जिस प्रकार सूर्य कभी आलस्य नहीं करता, उसी प्रकार अर्थार्जन एक सतत साधना है। "बैठे रहने वाले का भाग्य भी बैठ जाता है और चलने वाले का भाग्य भी चलने लगता है।"

  • अर्थसिद्धि के तीन व्यक्तित्व (मत्स्य न्याय) -
    1. अनागतविधाता (Visionary) - आने वाले संकट या अवसर को पहले ही भांप लेना। यह बाज़ार के 'First Mover Advantage' जैसा गुण है।
    2. प्रत्युत्पन्नमति (Agile) - संकट आने पर तुरंत समाधान खोजने वाली बुद्धि। यह 'Hustler Mentality' और लचीलापन (Adaptability) है।
    3. यद्भविष्य (Patience & Skill) - विपरीत समय में धैर्य (धृति) रखना और कौशल की जड़ें मजबूत करना। जब फल नहीं दिख रहा हो, तब 'चीनी बांस' की तरह अपनी नींव बनाना।

  • धनी बनने का व्यावहारिक सूत्र - धनी केवल वह नहीं जो अधिक कमाता है, अपितु वह है जो बचत करना जानता है। अर्जन के समय अपने से श्रेष्ठ को देखें (प्रेरणा हेतु) और व्यय के समय अपने से निर्धन को (संतोष हेतु)। लक्ष्य कुम्भीधान्यक (1 वर्ष का संचय) या कुसूलधान्यक (3 वर्ष का संचय) बनने का होना चाहिए।

  • प्रगति के ६ स्तंभ बनाम ६ छिद्र -
    • सफलता के कारक - उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम।
    • पतन के कारक - अधिक निद्रा, तन्द्रा (सुस्ती), भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता (काम टालने की आदत)।

  • अर्थार्जन के ६ शाश्वत मार्ग - संसार की हर जीविका भिक्षा (Grant/Funding), राजसेवा (Job), कृषि (Necessities/Basics), विद्या (Professional Skills), वाणिज्य (Business) या लेनदेन (Finance/Banking) के अंतर्गत आती है। इनमें 'वाणिज्य' को श्रेष्ठ माना गया है।

  • अर्थ की रक्षा और विनियोग - "अर्थो रक्षति रक्षितः"—जो प्राप्त नहीं है उसे धर्म से पाना, जो मिल गया उसकी रक्षा करना, रक्षित धन को बढ़ाना और बढ़े हुए धन को सुपात्र को दान करना ही अर्थ की पूर्णता है।



निष्कर्ष - अर्थ वह ऊर्जा है जो धर्म, काम और मोक्ष का आधार बनती है। यदि अर्थ का अर्जन पुरुषार्थ से, रक्षण सावधानी से और व्यय विवेक (लोकहित) से किया जाए, तो वही संपत्ति 'ईश्वर का प्रसाद' बन जाती है।


यह तालिका जीवन में सफलता, चरित्र निर्माण और आर्थिक संतुलन के सिद्धांतों को स्पष्ट करती है॥


सूत्र (Sutra)सरल अर्थ (Simple Meaning)आधुनिक भाषा में (Business Logic)
१. धनी की व्याख्याधनी बनने के लिए व्यय भी कम करोकुम्भीधान्यक अथवा कुसूलधान्यक बनने का प्रयास करें
२. अनागतविधाताभविष्य को आज देख लेनाआने वाले कल को पहचान कर पहले से सज्ज होना (Vision/Forecasting)।
३. प्रत्युत्पन्नमतिमौके पर बुद्धि चलानासमस्या आने पर रोने के स्थान पर तुरंत रास्ता बदलना (Agility/Pivot)।
४. यद्भविष्यधृति, तितिक्षा और तपजब काम न दिख रहा हो, तब कौशल (Skills) की जड़ें मजबूत करना (Timing)।
५. षडगुणप्रगति का इंजनउद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम को अपना हथियार बनाना।
६. षडदोषअर्थ नाश के छिद्रनिद्रा, तंद्रा, दीर्घसूत्रता, आलस्य, भय और क्रोध के छिद्रों को बंद करना।
७. यथोचित मार्गव्यापार सबसे उत्तम मार्ग हैभिक्षा, राजसेवा, कृषि, विद्या, वाणिज्य और लेनदेन में से एक मार्ग चुनना

जब भी दुविधा हो, तो वह चुनें जो अभी कठिन है पर भविष्य में सुखद (श्रेय), न कि वह जो अभी सुखद है पर भविष्य में कष्टकारी (प्रेय)। कोई भी आप कर्म कर रहें हो तो देखें कि क्या वह -


  1. आपको धन दिला पा रहा है।
  2. आपके परिवार को पालने योग्य आजीविका प्रदान कर रहा है।
  3. आपको व्यापार खड़ा करने में सहायता देता है।
  4. आपको कुम्भीधान्यक अथवा कुसूलधान्यक बनने की ओर अग्रसित करता है।

आशा करता हूँ आपको अर्थ की महिमा और उसके प्राप्ति का सूत्र जीवन में प्रगति देगा॥