[{"data":1,"prerenderedAt":1954},["ShallowReactive",2],{"content-\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_08_purushartha_kaam":3,"content-query-4cLWWohTz6":51},[4,12,17,21,25,29,33,37,41,45,49],{"_path":5,"title":6,"description":7,"part":8,"image":9,"prev_path":10,"next_path":11},"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fintro_01_intro","॥ परिचय ॥","यहाँ हम वैदिक दृष्टि से जीवन को समझने का प्रयास करेंगे। हम यहाँ कई सूत्रों को जोड़कर जीवन में सफल होने के उपाय ढूँढेंगे॥\n","॥ प्रस्तावना ॥","\u002Fimages\u002Fshiksha\u002Fjeevan_darshan.jpeg",null,"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_01_tripakshiyavivek",{"_path":11,"title":13,"description":14,"part":15,"image":9,"prev_path":5,"next_path":16},"॥ तृतीय मार्ग ॥","ज्ञान की परिक्षा का तीसरा मार्ग। बिना जिसके ज्ञान को प्रमाणित करना कठिन है॥\n","॥ आत्मज्ञान ॥","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_02_jnaan",{"_path":16,"title":18,"description":19,"part":15,"image":9,"prev_path":11,"next_path":20},"॥ ज्ञान ॥","ज्ञान से विद्या तक। व्यावहारिक अधिगम के प्राचीन चरण। यह स्पष्ट करता है कि कैसे सतही ज्ञान को जीवन का अंग बनाया जाता है॥","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_03_chittvijnaan",{"_path":20,"title":22,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":16,"next_path":24},"॥ चित्तविज्ञान ॥","पुरुषार्थ का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_04_varnn",{"_path":24,"title":26,"description":27,"part":15,"image":9,"prev_path":20,"next_path":28},"॥ चतुर्वण ॥","चतुर्वर्ण की तार्किक समीक्षा: अष्टलक्ष्मी, अष्टसरस्वती और एकादश शक्ति के माध्यम से समझिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का वास्तविक स्वरूप। प्राचीन दर्शन का आधुनिक विश्लेषण॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_05_ashram",{"_path":28,"title":30,"description":31,"part":15,"image":9,"prev_path":24,"next_path":32},"॥ आश्रम ॥","वर्णाश्रम की तार्किक समीक्षा और महत्व॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_06_purushartha_dharm",{"_path":32,"title":34,"description":35,"part":15,"image":9,"prev_path":28,"next_path":36},"॥ पुरुषार्थ (धर्म)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से धर्म की व्याख्या और धर्म परायण होने के लिए एक सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_07_purushartha_arth",{"_path":36,"title":38,"description":39,"part":15,"image":9,"prev_path":32,"next_path":40},"॥ पुरुषार्थ (अर्थ) ॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से अर्थ की व्याख्या और अर्थार्जन के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_08_purushartha_kaam",{"_path":40,"title":42,"description":43,"part":15,"image":9,"prev_path":36,"next_path":44},"॥ पुरुषार्थ (काम)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से काम का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_09_purushartha_moksha",{"_path":44,"title":46,"description":47,"part":15,"image":9,"prev_path":40,"next_path":48},"॥ पुरुषार्थ (मोक्ष)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से मोक्ष का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र।\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_10_purushartha_nishkarsha",{"_path":48,"title":50,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":44,"next_path":10},"॥ पुरुषार्थ (निष्कर्ष) ॥",{"_path":40,"_dir":52,"_draft":53,"_partial":53,"_locale":54,"title":42,"description":43,"navigation":55,"part":15,"author":56,"image":9,"tag":57,"body":61,"_type":1948,"_id":1949,"_source":1950,"_file":1951,"_stem":1952,"_extension":1953},"vedicjeevan",false,"",true,"Vikram Singh Rawat",[58,59,60],"literature","book","jeevandarshan",{"type":62,"children":63,"toc":1936},"root",[64,74,92,96,140,143,147,150,158,161,168,171,197,200,205,208,227,230,235,238,264,267,272,275,301,304,316,319,345,348,353,356,388,391,424,427,432,435,440,443,448,451,456,459,485,488,493,496,501,504,509,512,517,520,546,549,554,557,563,566,592,595,600,603,638,641,646,649,675,678,690,693,719,722,1443,1446,1452,1455,1499,1502,1505,1508,1547,1550,1591,1594,1618,1621,1665,1668,1687,1690,1693,1696,1899,1902,1907,1910,1928,1931],{"type":65,"tag":66,"props":67,"children":68},"element","h1",{"id":54},[69],{"type":65,"tag":70,"props":71,"children":73},"binding",{"value":72},"$doc.title",[],{"type":65,"tag":75,"props":76,"children":79},"div",{"className":77},[78],"sub_heading",[80],{"type":65,"tag":81,"props":82,"children":83},"p",{},[84],{"type":65,"tag":85,"props":86,"children":87},"strong",{},[88],{"type":65,"tag":70,"props":89,"children":91},{"value":90},"$doc.description",[],{"type":65,"tag":93,"props":94,"children":95},"br",{},[],{"type":65,"tag":75,"props":97,"children":100},{"className":98},[99],"shloka",[101],{"type":65,"tag":102,"props":103,"children":104},"blockquote",{},[105],{"type":65,"tag":81,"props":106,"children":107},{},[108,111,117,119,124,126,131,133,138],{"type":109,"value":110},"text","काममय एवायं पुरुष इति।\n",{"type":65,"tag":112,"props":113,"children":114},"em",{},[115],{"type":109,"value":116},"यह पुरुष (जीव) वास्तव में काममय है — इच्छाओं से ही निर्मित।",{"type":109,"value":118},"\nस यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति।\n",{"type":65,"tag":112,"props":120,"children":121},{},[122],{"type":109,"value":123},"जैसी उसकी इच्छा होती है, वैसा ही उसका संकल्प बनता है।",{"type":109,"value":125},"\nयत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते।\n",{"type":65,"tag":112,"props":127,"children":128},{},[129],{"type":109,"value":130},"जैसा संकल्प होता है, वैसा ही कर्म करता है।",{"type":109,"value":132},"\nयत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":134,"children":135},{},[136],{"type":109,"value":137},"और जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है।",{"type":109,"value":139},"\n— (बृहदारण्यक उपनिषद् ४.४.५)",{"type":65,"tag":93,"props":141,"children":142},{},[],{"type":65,"tag":144,"props":145,"children":146},"hr",{},[],{"type":65,"tag":93,"props":148,"children":149},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":151,"children":152},{},[153],{"type":65,"tag":154,"props":155,"children":157},"img",{"alt":156,"src":9},"॥ पुरुषार्थ ॥",[],{"type":65,"tag":93,"props":159,"children":160},{},[],{"type":65,"tag":162,"props":163,"children":165},"h2",{"id":164},"काम-सौंदर्य-इच्छा-रसानंद",[166],{"type":109,"value":167},"काम (सौंदर्य, इच्छा, रसानंद)",{"type":65,"tag":93,"props":169,"children":170},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":172,"children":174},{"className":173},[99],[175],{"type":65,"tag":102,"props":176,"children":177},{},[178],{"type":65,"tag":81,"props":179,"children":180},{},[181,183,188,190,195],{"type":109,"value":182},"अकामतः क्रिया काचित् दृश्यते नेह कर्हिचित्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":184,"children":185},{},[186],{"type":109,"value":187},"इस संसार में बिना किसी कामना (इच्छा) के कभी कोई क्रिया दिखाई नहीं देती।",{"type":109,"value":189},"\nयद्यद्धि कुरुते किञ्चित् तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":191,"children":192},{},[193],{"type":109,"value":194},"मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह सब उसकी कामनाओं की ही चेष्टा (प्रयास) का परिणाम है।",{"type":109,"value":196},"\n— (मनुस्मृति, २.४)",{"type":65,"tag":93,"props":198,"children":199},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":201,"children":202},{},[203],{"type":109,"value":204},"काम का अर्थ केवल शारीरिक वासना नहीं, अपितु इच्छा, प्रेम, सौंदर्य, भावनाएँ, रचनात्मकता, कला,\nसंगीत, साहित्य, और जीवन के सभी आनंददायक अनुभव हैं। यदि अनुभव ना हो पाए तो उनकी इच्छा\nमात्र भी काम है। परंतु काम ही संसार में सारे कर्मों का मूल है। कामसूत्र में\n\"कामो नाम मनसो वाञ्छा\" — काम मन की वह वांछा है जो सौंदर्य और आनंद की ओर आकर्षित करती है। संसार की\nसारी तीव्र इच्छाएँ काम हैं। और इच्छाओं के बिना जीवन में कोई कर्म होगा ही नहीं॥",{"type":65,"tag":93,"props":206,"children":207},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":209,"children":211},{"className":210},[99],[212],{"type":65,"tag":102,"props":213,"children":214},{},[215],{"type":65,"tag":81,"props":216,"children":217},{},[218,220,225],{"type":109,"value":219},"इन्द्रियाणां मनःसन्निकर्षेण स्वविषयेषु अनुकूलप्रवृत्तिः कामः॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":221,"children":222},{},[223],{"type":109,"value":224},"इन्द्रियों का मन के साथ जुड़ाव होने पर अपने-अपने विषयों में जो सुखद या अनुकूल प्रवृत्ति होती है, वही 'काम' है।",{"type":109,"value":226},"\n— कामसूत्र (१.२.११)",{"type":65,"tag":93,"props":228,"children":229},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":231,"children":232},{},[233],{"type":109,"value":234},"काम का संतुलित और धर्मसम्मत पालन जीवन को आनंदमय, रचनात्मक और संतुलित बनाता है।\nकाम का दमन मानसिक विकृति, तनाव और सामाजिक विघटन को जन्म देता है, जबकि उसका\nअतिरेक पतन का कारण बनता है। सामान्यतः समाज में 'काम' (Desires) को अध्यात्म का शत्रु\nमानकर उसे दबाने या उससे भागने की शिक्षा दी जाती है। लेकिन यदि हम गहरे भारतीय दर्शन\nऔर उपनिषदों की ओर मुड़ें, तो पाते हैं कि काम कोई पाप नहीं, अपितु जीवन की वह प्राथमिक\nऊर्जा है जिसे यदि दिशा मिल जाए, तो वह 'समाधि' का मार्ग प्रशस्त करती है।",{"type":65,"tag":93,"props":236,"children":237},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":239,"children":241},{"className":240},[99],[242],{"type":65,"tag":102,"props":243,"children":244},{},[245],{"type":65,"tag":81,"props":246,"children":247},{},[248,250,255,257,262],{"type":109,"value":249},"कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":251,"children":252},{},[253],{"type":109,"value":254},"सृष्टि के आरम्भ में सबसे पहले 'काम' (सृजन की इच्छा) उत्पन्न हुआ, जो मन का प्रथम बीज था।",{"type":109,"value":256},"\nसतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":258,"children":259},{},[260],{"type":109,"value":261},"बुद्धिमान ऋषियों ने अपने अंतःकरण में खोज करते हुए अपनी मेधा से 'सत' (अस्तित्व) के संबंध को 'असत' (अस्तित्वहीनता) में ढूँढ निकाला।",{"type":109,"value":263},"\n— (ऋग्वेद, १०.१२९.४)",{"type":65,"tag":93,"props":265,"children":266},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":268,"children":269},{},[270],{"type":109,"value":271},"ये सारा संसार अस्तित्व में आया क्योंकि ब्रह्म को इच्छा हुई की संसार उत्पन्न हो जाए।\nसृष्टि का मूल भी काम है। उपरोक्त श्लोक इस बात की पुष्टि करता है। और साथ ही\nस्वयं भगवान श्री कृष्ण स्वयं को उस 'काम' के रूप में स्वीकार करते हैं जो धर्म के विरुद्ध नहीं है।\nयह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि काम ऊर्जा अपने आप में अशुद्ध नहीं है॥",{"type":65,"tag":93,"props":273,"children":274},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":276,"children":278},{"className":277},[99],[279],{"type":65,"tag":102,"props":280,"children":281},{},[282],{"type":65,"tag":81,"props":283,"children":284},{},[285,287,292,294,299],{"type":109,"value":286},"बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् |\n",{"type":65,"tag":112,"props":288,"children":289},{},[290],{"type":109,"value":291},"बलवानों में वह बल मैं हूँ, जो काम (आसक्ति) और राग (मोह) से रहित है।",{"type":109,"value":293},"\nधर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ||\n",{"type":65,"tag":112,"props":295,"children":296},{},[297],{"type":109,"value":298},"हे भरतश्रेष्ठ! प्राणियों में धर्म के अनुकूल (मर्यादा के भीतर) जो काम (इच्छा) है, वह मैं हूँ।",{"type":109,"value":300},"\n— (श्रीमद्भगवद्गीता, ७.११)",{"type":65,"tag":93,"props":302,"children":303},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":305,"children":306},{},[307,309,314],{"type":109,"value":308},"बिना रस के, बिना आनंद के संसार का कोई मोल नहीं। कोई भी संसार में जन्म क्यों लेगा यदि यहाँ\nरस ना हो, आनंद ना हो। जब बारम्बार इसी धरा पर जन्म लेना है तो इसी धरा को और सुंदर बनाओ।\nयहाँ रसानंद लो और इसे ही स्वर्ग बना लो। यदि यहाँ से जाना है प्रभू की भक्ति का रस चखो और\nमोक्ष प्राप्त कर लो। ये नव रस ही सारे संसार के काम का मूल है।\nइसलिए तो वेदों में गंधर्ववेद को भी पढ़ाया जाता है। संगीतकला, छंदकला,\nनृत्यकला, चित्रकला, पाककला ऐसी 64 कलाएँ भारत में धर्म को समझने के लिए पढ़ाई जाती थी।\nक्यों हर एक कला एक योग है और वह योग आपको ब्रह्म से मिला सकता है। वैसे\n'सृजन' (Creation) भी काम का ही एक रूप है। जैसे संगीत से नादयोग, छंदकला से मंत्रयोग,\nनृत्य से नटयोग, व्यायाम से हठयोग, शब्दयोग, कुण्डलिनी योग इत्यादि सब प्रभू का सार भी हैं और सब रस को\nभी समझते हैं। उपनिषद सिखाते हैं कि आनंद का स्रोत 'रस' है और परमात्मा स्वयं ",{"type":65,"tag":85,"props":310,"children":311},{},[312],{"type":109,"value":313},"'रसो वै सः'",{"type":109,"value":315},"\n(वह रस स्वरूप है) है। जीवन के रसों से भागना नहीं, अपितु उन्हें जानते हुए उनसे ऊपर उठना ही पुरुषार्थ है॥",{"type":65,"tag":93,"props":317,"children":318},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":320,"children":322},{"className":321},[99],[323],{"type":65,"tag":102,"props":324,"children":325},{},[326],{"type":65,"tag":81,"props":327,"children":328},{},[329,331,336,338,343],{"type":109,"value":330},"रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वा आनन्दी भवति।\n",{"type":65,"tag":112,"props":332,"children":333},{},[334],{"type":109,"value":335},"वह (परमात्मा) ही रस स्वरूप है। उस रस को प्राप्त करके ही यह जीवात्मा आनन्दित होता है।",{"type":109,"value":337},"\nको ह्येवान्यत् कः प्राण्यात्। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":339,"children":340},{},[341],{"type":109,"value":342},"यदि इस हृदयाकाश में यह आनन्द न होता, तो भला कौन चेष्टा करता और कौन जीवित रहता?",{"type":109,"value":344},"\n— (तैत्तिरीय उपनिषद्, २.७.१)",{"type":65,"tag":93,"props":346,"children":347},{},[],{"type":65,"tag":162,"props":349,"children":351},{"id":350},"संभोग",[352],{"type":109,"value":350},{"type":65,"tag":93,"props":354,"children":355},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":357,"children":359},{"className":358},[99],[360],{"type":65,"tag":102,"props":361,"children":362},{},[363],{"type":65,"tag":81,"props":364,"children":365},{},[366,368,371,376,378,381,386],{"type":109,"value":367},"ये चिद्धि पूर्वे ऋतसाप आसन् साकं देवेभिरवदन्नृतानि।",{"type":65,"tag":93,"props":369,"children":370},{},[],{"type":65,"tag":112,"props":372,"children":373},{},[374],{"type":109,"value":375},"वे प्राचीन ऋषि, जो ऋत (सत्य) के साधक थे, देवों के साथ मिलकर सत्य-वचन करते थे।",{"type":109,"value":377},"\nते चिदवासुर्नह्यन्तमापुः समू नु पत्नीर्वृषभिर्जगम्युः॥",{"type":65,"tag":93,"props":379,"children":380},{},[],{"type":65,"tag":112,"props":382,"children":383},{},[384],{"type":109,"value":385},"उन्होंने ब्रह्मचर्य-व्रत का अतिक्रमण किए बिना ही गृहस्थ-धर्म का पालन किया, वे अपनी पत्नियों के पास गए और संतानोत्पत्ति की।",{"type":109,"value":387},"\n— (ऋग्वेद १.१७९.२)",{"type":65,"tag":93,"props":389,"children":390},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":392,"children":393},{},[394,396,401,403,408,410,415,417,422],{"type":109,"value":395},"हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि तीन प्रकार के ऋण है ",{"type":65,"tag":85,"props":397,"children":398},{},[399],{"type":109,"value":400},"ऋषि ऋण, पितृ ऋण और देव ऋण",{"type":109,"value":402},"।\nपितृ ऋण को चुकाने के कई सोपान हैं। उनमें से एक संभोग भी है। पितृ अपने पाप-पुण्य भोगने\nके पश्चात एक लोक में रुकते हैं जिसे ",{"type":65,"tag":85,"props":404,"children":405},{},[406],{"type":109,"value":407},"'पुत लोक'",{"type":109,"value":409}," कहा जाता है। शास्त्रों में 'पुत' (या पुं)\nनाम का एक विशेष नर्क बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति संतानहीन होते हैं, उन्हें इस\nकष्टकारी लोक में जाना पड़ता है। यहाँ आत्माएँ अपने अगले जन्म के लिए उचित शरीर और\nसमय (प्रारब्ध) की प्रतीक्षा करती हैं। वंश में बच्चों का जन्म होना पितरों के लिए एक नया अवसर\nमाना जाता है। मान्यता है कि पितर ही सामान्यतः अपने ही कुल में पोते-पोतियों के रूप में पुनर्जन्म\nलेते हैं ताकि वे अपने अधूरे कर्मों को पूरा कर सकें। इसलिए बच्चों को ",{"type":65,"tag":85,"props":411,"children":412},{},[413],{"type":109,"value":414},"पुत्र और पुत्री",{"type":109,"value":416}," कहते\nहैं, की उन्होंने पुत लोक को तार दिया। वहाँ एक ",{"type":65,"tag":85,"props":418,"children":419},{},[420],{"type":109,"value":421},"अंधकूप",{"type":109,"value":423}," होता है जहाँ पर उनके गिरने की\nनिरंतर संभावना बनी रहती है और वो सदैव प्रतीक्षाग्रस्त होते हैं॥",{"type":65,"tag":93,"props":425,"children":426},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":428,"children":429},{},[430],{"type":109,"value":431},"ये बताता है कि संसार को सुचारू रूप से चलने के लिए आपको विवाह करना पड़ेगा और बच्चे पैदा करने पड़ेंगें।\nऐसी कुछ कथाएँ शास्त्रों में हैं। उनमें से दो मैं बताता हूँ। महर्षि अगस्त्य घोर तपस्वी थे और उन्होंने विवाह न करने\nका निश्चय किया था। एक बार भ्रमण करते हुए उन्होंने एक विशाल कुआँ देखा, जिसमें उनके\nपूर्वज (पितर) पैर ऊपर और सिर नीचे करके लटके हुए थे। उनकी दशा अत्यंत दयनीय थी।\nअगस्त्य जी ने जब उनसे इसका कारण पूछा, तो उन्होंने कहा:\n\"हे पुत्र! हम तुम्हारे पूर्वज हैं। तुम्हारे विवाह न करने और संतान उत्पन्न न करने के कारण हमारा\n'संतान-तन्तु' (वंश की निरंतरता) टूट गया है। जो व्यक्ति संतानहीन होता है, उसे 'पुत्' नामक नरक में जाना पड़ता\nहै। हम इसी कारण यहाँ लटके हुए हैं। यदि तुम विवाह करके पुत्र उत्पन्न करोगे, तभी हमें मुक्ति मिलेगी और हम\nदिव्य लोकों को जा सकेंगे।\" इसलिए उन्होंने लोपमुद्रा से विवाह करा॥",{"type":65,"tag":93,"props":433,"children":434},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":436,"children":437},{},[438],{"type":109,"value":439},"विवाह के बाद भी अगस्त्य मुनि केवल तपस्या और साधना में लगे रहते थे। तब लोपामुद्रा उन्हें 'काम' और\nदांपत्य जीवन के महत्व को समझाते हुए कहती हैं: \"मैं कई वर्षों से दिन-रात तुम्हारी सेवा कर रही हूँ। अब बुढ़ापा मेरे\nशरीर की सुंदरता को कम कर रहा है। जो प्राचीन काल के महान ऋषि थे,\nजो सत्य के मार्ग पर चलते थे और देवताओं के साथ संवाद करते थे, उन्होंने भी अपनी पत्नियों के साथ\nसहवास किया और संतान उत्पन्न की। तपस्या और दांपत्य जीवन (काम) दोनों का संतुलन आवश्यक है।\"\nइसके बाद अगस्त्य मुनि स्वीकार करते हैं कि केवल तपस्या ही जीवन का सत्य\nनहीं है, अपितु पत्नी के साथ प्रेम और सृजन भी उतना ही पवित्र है॥",{"type":65,"tag":93,"props":441,"children":442},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":444,"children":445},{},[446],{"type":109,"value":447},"और ऐसी कथाएँ आपको महर्षि जरत्कारु, प्रजापति रुचि, महर्षि मंदपाल इत्यादि महानुभावों\nकी भी मिलेंगीं। तो हमने कामशास्त्र लिखा, खजुराहो के मंदिर बनाए, अजंता ऐलोरा की गुफाएँ बनाई,\n4 पुरुषार्थों में काम को रखा। आदि शंकराचार्य जीवन में केवल एक शास्त्रार्थ हारते हैं, विदुषी उभय भारती\nसे, और उसका विषय होता है कामशास्त्र, चुँकि शंकराचार्य एक सन्यासी थे उन्हे इसका कोई ज्ञान नहीं था।\nफिर वह 6 महीने एक राजा के साथ रहते हैं जिसकी 100 रानियाँ थी और कामशास्त्र सीख कर आते हैं और उभय भारती को फिर\nहराते हैं। हमारे में कामदेव और रति की भी पूजा की जाती है। तो मेरा तात्पर्य है कि हमने\nसंभोग को कभी भी हेय नहीं माना अपितु संसार का चक्र चलाने के लिए\nआवश्यक कारक माना। जब श्री कृष्ण स्वयं कह रहे हैं कि मैं काम हूँ। तो काम को हेय मानना एक भूल है।\nसंभोग यहाँ केवल प्रजनन का साधन नहीं, अपितु दो आत्माओं के बीच 'ऋत' (सत्य\u002Fनियम) का निर्वहन भी है।\nपरंतु मूल अंतर है काम वासना और काम योग जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।",{"type":65,"tag":93,"props":449,"children":450},{},[],{"type":65,"tag":162,"props":452,"children":454},{"id":453},"समाधि",[455],{"type":109,"value":453},{"type":65,"tag":93,"props":457,"children":458},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":460,"children":462},{"className":461},[99],[463],{"type":65,"tag":102,"props":464,"children":465},{},[466],{"type":65,"tag":81,"props":467,"children":468},{},[469,471,476,478,483],{"type":109,"value":470},"भोगेन भोगं त्यजति योगी योगेन चापरम्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":472,"children":473},{},[474],{"type":109,"value":475},"योगी भोग को भोगकर ही उससे ऊपर उठता है, और योग से शेष वासनाएँ शांत होती हैं।",{"type":109,"value":477},"\nभोगयोगयुतो देवि मुक्तिमार्गं स गच्छति॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":479,"children":480},{},[481],{"type":109,"value":482},"हे देवि! भोग और योग—दोनों के संतुलन से ही साधक मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है।",{"type":109,"value":484},"\n— (कुलार्णव तंत्र, २.५६)",{"type":65,"tag":93,"props":486,"children":487},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":489,"children":490},{},[491],{"type":109,"value":492},"गोरखनाथ और उनके शिष्य की एक कथा नाथ पंथ की परंपराओं में बहुत प्रचलित है।\nयह विशेष रूप से 'अनुभव' के माध्यम से 'वैराग्य' की प्राप्ति को दर्शाती है। भारतीय दर्शन में\nइसे 'भुक्ति से मुक्ति' का मार्ग कहा जाता है, जहाँ दमन (Suppression) के स्थान पर तृप्ति (Saturation) के\nमाध्यम से मन को शांत किया जाता है। गुरु गोरखनाथ के पास एक शिष्य आया जो साधना तो करना चाहता था,\nपरंतु उसकी तामसिक वृत्तियाँ बहुत प्रबल थीं। उसने गुरु से निवेदन किया— \"हे नाथ! मैं योग मार्ग पर चलना चाहता हूँ,\nकिंतु मेरा मन मांस खाने की प्रबल इच्छा से ग्रस्त है। मैं चाहकर भी इस स्वाद को छोड़ नहीं पा रहा हूँ।\"",{"type":65,"tag":93,"props":494,"children":495},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":497,"children":498},{},[499],{"type":109,"value":500},"गुरु गोरखनाथ जानते थे कि यदि शिष्य को बलात रोका गया, तो उसका मन सदैव उसी विचार में अटका रहेगा।\nउन्होंने शिष्य की आंखों में झाँका और अपनी योगशक्ति से उसे एक वनराज (शेर) बना दिया। गुरु ने\nकहा — \"जाओ, अब तुम स्वतंत्र हो। जी भरकर अपनी इस भूख को शांत करो।\"\nवह शिष्य शेर के रूप में १२ वर्षों तक घने जंगलों में रहा। उसने अनगिनत शिकार किए, निरंतर मांस का भक्षण\nकिया और अपनी उस वासना को चरम सीमा तक जी लिया।",{"type":65,"tag":93,"props":502,"children":503},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":505,"children":506},{},[507],{"type":109,"value":508},"१२ वर्ष बाद गुरु गोरखनाथ उसी वन से गुजरे। उन्होंने उस शेर को पुकारा। शेर गुरु के चरणों में आकर गिर पड़ा।\nउसकी आँखों में अब वह हिंसक चमक नहीं, अपितु एक गहरी ऊब और शांति थी। उसने\nकहा— \"प्रभु! मैं वितृप्त हो गया हूँ (पूर्णतः तृप्त और थक गया हूँ)। अब मांस के प्रति न तो आकर्षण बचा है,\nन ही उसकी गंध सुख देती है। मैंने देख लिया कि जिस रस के पीछे मैं भाग रहा था, वह\nकेवल नश्वर है। अब मुझे इस पशु देह और वासना से मुक्ति दें।\" गोरखनाथ ने अपनी शक्ति से उसे पुनः मनुष्य\nरूप में बदल दिया। अब वह शिष्य पूरी तरह शुद्ध हो चुका था क्योंकि\nउसकी वासना अब \"दबी हुई\" नहीं थी, अपितु \"अनुभव होकर समाप्त\" हो चुकी थी।\nजहाँ गोरखनाथ का शिष्य भोग से थक कर लौटा, वहीं अगस्त्य ने भोग को योग बना लिया।",{"type":65,"tag":93,"props":510,"children":511},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":513,"children":514},{},[515],{"type":109,"value":516},"यही बात अष्टावक्र गीता में स्वयं ऋषि अष्टावक्र भी करते हैं।",{"type":65,"tag":93,"props":518,"children":519},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":521,"children":523},{"className":522},[99],[524],{"type":65,"tag":102,"props":525,"children":526},{},[527],{"type":65,"tag":81,"props":528,"children":529},{},[530,532,537,539,544],{"type":109,"value":531},"यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":533,"children":534},{},[535],{"type":109,"value":536},"जहाँ यह सम्पूर्ण विश्व रज्जु पर सर्प की भाँति कल्पित प्रतीत होता है,",{"type":109,"value":538},"\nतदानन्दपदं ज्ञात्वा जीवन्मुक्तः सुखी भव॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":540,"children":541},{},[542],{"type":109,"value":543},"उस आनन्दस्वरूप पद को जानकर मनुष्य जीवन्मुक्त होकर सुखी हो जाता है।",{"type":109,"value":545},"\n— (अष्टावक्र गीता २.७)",{"type":65,"tag":93,"props":547,"children":548},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":550,"children":551},{},[552],{"type":109,"value":553},"इसी बात को ओशो भी लिखते हैं कि व्यक्ति संभोग से समाधि तक पहुँच सकता है। और शास्त्र भी इसकी पुष्टि करते हैं।\nहाँ परंतु अब हमें काम वासना और काम योग का अंतर भी स्पष्ट करना होगा॥",{"type":65,"tag":93,"props":555,"children":556},{},[],{"type":65,"tag":162,"props":558,"children":560},{"id":559},"कर्म-के-रूप",[561],{"type":109,"value":562},"कर्म के रूप",{"type":65,"tag":93,"props":564,"children":565},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":567,"children":569},{"className":568},[99],[570],{"type":65,"tag":102,"props":571,"children":572},{},[573],{"type":65,"tag":81,"props":574,"children":575},{},[576,578,583,585,590],{"type":109,"value":577},"तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।\n",{"type":65,"tag":112,"props":579,"children":580},{},[581],{"type":109,"value":582},"इसलिए आसक्ति रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म का आचरण करो।",{"type":109,"value":584},"\nअसक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":586,"children":587},{},[588],{"type":109,"value":589},"क्योंकि आसक्ति रहित होकर कर्म करने वाला पुरुष परम पद को प्राप्त होता है।",{"type":109,"value":591},"\n— (भगवद्गीता ३.१९)",{"type":65,"tag":93,"props":593,"children":594},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":596,"children":597},{},[598],{"type":109,"value":599},"जीवन की यात्रा में 'काम' और 'कर्म' दो ऐसे स्तंभ हैं जो हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं।\nसामान्यतः हम 'काम' को केवल वासना या इच्छा तक सीमित मान लेते हैं, परंतु भारतीय दर्शन में यह पुरुषार्थ का एक\nमहत्वपूर्ण अंग है। यदि इसे धर्म और संयम के साथ जोड़ा जाए तो यही योग भी है।\nभगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म की सूक्ष्म गति को समझाया है। हमें अपने कार्यों को केवल शारीरिक\nगतिविधि नहीं, अपितु एक साधना के रूप में देखना चाहिए। कर्म 3 प्रकार के होते हैं जिन्हे कर्म की\nत्रिवेणी भी कहा जाता है। ये हैं:",{"type":65,"tag":93,"props":601,"children":602},{},[],{"type":65,"tag":604,"props":605,"children":606},"ul",{},[607,618,628],{"type":65,"tag":608,"props":609,"children":610},"li",{},[611,616],{"type":65,"tag":85,"props":612,"children":613},{},[614],{"type":109,"value":615},"सकर्म -",{"type":109,"value":617}," फल की इच्छा के साथ किया गया शुभ कार्य।",{"type":65,"tag":608,"props":619,"children":620},{},[621,626],{"type":65,"tag":85,"props":622,"children":623},{},[624],{"type":109,"value":625},"विकर्म -",{"type":109,"value":627}," गलत मार्ग पर ले जाने वाले निषिद्ध कर्म।",{"type":65,"tag":608,"props":629,"children":630},{},[631,636],{"type":65,"tag":85,"props":632,"children":633},{},[634],{"type":109,"value":635},"अकर्म -",{"type":109,"value":637}," कर्म करते हुए भी फल के प्रति अनासक्त रहना (यही वास्तव में कर्मयोग है)।",{"type":65,"tag":93,"props":639,"children":640},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":642,"children":643},{},[644],{"type":109,"value":645},"उपनिषद भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि संसार में इस भाव से भोग करना चाहिए की ये मेरा नहीं है और\nये किसी का ऋण है जिसे चुकाना पड़ेगा। काम को संयमित रखने का अर्थ दमन नहीं, अपितु उसका\nउदात्तीकरण (Sublimation) है। जब हम प्रत्येक वस्तु में ईश्वर का वास देखते हैं, तो हमारी दृष्टि बदल जाती है।",{"type":65,"tag":93,"props":647,"children":648},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":650,"children":652},{"className":651},[99],[653],{"type":65,"tag":102,"props":654,"children":655},{},[656],{"type":65,"tag":81,"props":657,"children":658},{},[659,661,666,668,673],{"type":109,"value":660},"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":662,"children":663},{},[664],{"type":109,"value":665},"इस जगत में जो कुछ भी गतिशील है—सब ईश्वर से आवृत है।",{"type":109,"value":667},"\nतेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":669,"children":670},{},[671],{"type":109,"value":672},"त्यागभाव से उसका उपभोग करो, किसी और के धन पर लोभ मत करो।",{"type":109,"value":674},"\n— (ईशोपनिषद् १)",{"type":65,"tag":93,"props":676,"children":677},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":679,"children":680},{},[681,683,688],{"type":109,"value":682},"जब हम किसी कार्य से बहुत अधिक चिपक जाते हैं, तो वह 'काम-वासना' बन जाता है, लेकिन जब हम उसे कर्तव्य\nमानकर करते हैं, तो वह 'काम-योग' बन जाता है। काम वासना और काम योग के बीच की रेखा बहुत पतली\nहै—वह रेखा है ",{"type":65,"tag":85,"props":684,"children":685},{},[686],{"type":109,"value":687},"'आसक्ति'",{"type":109,"value":689},"। विषयों का निरंतर चिंतन क्रोध और अशांति लाता है, जबकि कर्तव्य भाव से\nकिया गया कर्म शांति और मुक्ति प्रदान करता है। पुरुषार्थ का अर्थ यही है कि हम संसार में रहें, उपभोग भी\nकरें, परंतु 'त्याग' और 'अनासक्ति' के बोध के साथ। गीता भी इसकी पुष्टि करती है कि कामयोग और काम वासना में\nक्या अंतर है॥",{"type":65,"tag":93,"props":691,"children":692},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":694,"children":696},{"className":695},[99],[697],{"type":65,"tag":102,"props":698,"children":699},{},[700],{"type":65,"tag":81,"props":701,"children":702},{},[703,705,710,712,717],{"type":109,"value":704},"युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":706,"children":707},{},[708],{"type":109,"value":709},"योगयुक्त पुरुष कर्मफल का त्याग करके नैष्ठिकी शांति (मोक्ष) को प्राप्त होता है।",{"type":109,"value":711},"\nअयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":713,"children":714},{},[715],{"type":109,"value":716},"परंतु जो योगयुक्त नहीं है, वह कामना (वासना) के कारण फल में आसक्त होकर बँध जाता है।",{"type":109,"value":718},"\n— (श्रीमद्भगवद्गीता ५.१२)",{"type":65,"tag":93,"props":720,"children":721},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":723,"children":726},{"className":724},[725],"subtree",[727,733,736,762,765,784,787,827,830,835,838,843,846,851,854,859,862,867,870,875,878,902,905,917,920,938,941,959,962,980,983,1001,1004,1022,1025,1043,1046,1051,1054,1061,1064,1102,1105,1110,1113,1119,1122,1160,1163,1168,1171,1176,1179,1185,1188,1226,1229,1234,1237,1242,1245,1258,1261,1274,1277,1282,1285,1318,1321,1435,1438],{"type":65,"tag":162,"props":728,"children":730},{"id":729},"सत-असत-वास्तविक-स्थाई-ज्ञान",[731],{"type":109,"value":732},"सत-असत (वास्तविक स्थाई ज्ञान)",{"type":65,"tag":93,"props":734,"children":735},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":737,"children":739},{"className":738},[99],[740],{"type":65,"tag":102,"props":741,"children":742},{},[743],{"type":65,"tag":81,"props":744,"children":745},{},[746,748,753,755,760],{"type":109,"value":747},"नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।\n",{"type":65,"tag":112,"props":749,"children":750},{},[751],{"type":109,"value":752},"असत वस्तु की कोई सत्ता नहीं है, और सत का कभी अभाव नहीं होता।",{"type":109,"value":754},"\nउभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":756,"children":757},{},[758],{"type":109,"value":759},"तत्त्वदर्शियों ने इन दोनों के ही वास्तविक स्वरूप का अंत (निष्कर्ष) देख लिया है।",{"type":109,"value":761},"\n— (श्रीमद्भगवद्गीता २.१६)",{"type":65,"tag":93,"props":763,"children":764},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":766,"children":767},{},[768,770,775,777,782],{"type":109,"value":769},"अब मैं यहाँ सूत्र देता हूँ जो आपको अपनी कामना ( काम ऊर्जा ) को उचित मार्ग पर लगाने का मार्ग बताएगी।\nवैसे काम को साधने का मूल होता है अपनी इच्छाओं पर संयम रखना उसके लिए अपने मन पर संयम रखना चाहिए।\nकठोपनिषद् में भी कहा गया है शरीर एक रथ के समान है। आत्मा रथी है, बुद्धि सारथी और मन लगाम है। यह\nइंद्रिय रूपी घोड़ों को, जो निरंतर इधर-उधर भागते रहते हैं, उन्हे नियंत्रित करती है। इन्हे नियंत्रित करने के लिए मन को\nवश में करो। परंतु मैंने जो धर्म के प्रकरण में ",{"type":65,"tag":85,"props":771,"children":772},{},[773],{"type":109,"value":774},"मनसा, वाचा, कर्मणा",{"type":109,"value":776}," का सूत्र दिया था। वह ",{"type":65,"tag":85,"props":778,"children":779},{},[780],{"type":109,"value":781},"ऋत, सत और धर्म",{"type":109,"value":783},"\nसे मन को भी वश में करने के लिए सक्षम है। यहाँ तो मैं चाहता हूँ कि काम का दमन ना हो अपितु काम को उचित दिशा दी जाए।\nकाम का दमन तो सन्यास आश्रम वाले व्यक्तियों के लिए है। मैं तो पूरी पुस्तक ही ग्रहस्थों के लिए\nलिख रहा हूँ। जब सारा संसार ही काम से चलता है, हर कर्म के पीछे कोई आसक्ति है तो फिर काम\nकौन सा उचित है और कौन सा अनुचित है। ये ही हम समझ पाएँ तो जीवन में हर कार्य में अग्रिम होंगे॥",{"type":65,"tag":93,"props":785,"children":786},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":788,"children":790},{"className":789},[99],[791],{"type":65,"tag":102,"props":792,"children":793},{},[794],{"type":65,"tag":81,"props":795,"children":796},{},[797,799,804,806,811,813,818,820,825],{"type":109,"value":798},"आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।\n",{"type":65,"tag":112,"props":800,"children":801},{},[802],{"type":109,"value":803},"आत्मा को रथ का स्वामी (रथी) जानो और इस शरीर को केवल एक रथ समझो।",{"type":109,"value":805},"\nबुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":807,"children":808},{},[809],{"type":109,"value":810},"बुद्धि को सारथी (रथ चलाने वाला) जानो और मन को लगाम (लगाम\u002Fप्रग्रह) समझो।",{"type":109,"value":812},"\nइन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":814,"children":815},{},[816],{"type":109,"value":817},"इंद्रियों को रथ के घोड़े कहा गया है और विषय (रूप, रस, गंध आदि) वे मार्ग हैं जिन पर वे दौड़ते हैं।",{"type":109,"value":819},"\nआत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":821,"children":822},{},[823],{"type":109,"value":824},"शरीर, इंद्रिय और मन से युक्त उस आत्मा को ही मनीषी (विद्वान) 'भोक्ता' कहते हैं।",{"type":109,"value":826},"\n— (कठोपनिषद् १.३.३ - १.३.४)",{"type":65,"tag":93,"props":828,"children":829},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":831,"children":832},{},[833],{"type":109,"value":834},"पहले ये कथा समझते हैं। प्राचीन काल में एक अत्यंत तेजस्वी ऋषि घोर तपस्या में लीन थे।\nउनकी साधना इतनी दीर्घ और स्थिर थी कि समय के प्रवाह के साथ उनके शरीर पर दीमकों\nने अपना घर बना लिया और वे पूर्णतः एक वल्मीक (बाँबी) के भीतर समा गए। युग बीत गए,\nकिंतु ऋषि का ध्यान भंग न हुआ॥",{"type":65,"tag":93,"props":836,"children":837},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":839,"children":840},{},[841],{"type":109,"value":842},"एक समय उस वन में अपनी सहेलियों के साथ एक परम सुंदरी राजकुमारी का आगमन हुआ।\nकौतूहलवश राजकुमारी ने उस बाँबी में चमकते हुए दो बिंदुओं को देखा और उन्हें कोई रत्न समझकर\nएक तिनके से कुरेद दिया। वह ऋषि की आँखें थीं। ऋषि की समाधि भंग हुई और वे क्रोध के स्थान\nपर राजकुमारी के लावण्य को देखकर विचलित हो गए। युगों की तपस्या के पश्चात भी मन में सुप्त\nवासना जाग उठी और उन्होंने राजकुमारी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। राजकुमारी विदुषी और\nविवेकशील थी। उसने ऋषि के पतन को भांप लिया और विनम्रतापूर्वक कहा,\n\"हे ऋषिवर! मैं आपकी अर्धांगिनी अवश्य बनूँगी, किंतु आप एक माह पश्चात राजमहल पधारें।\"",{"type":65,"tag":93,"props":844,"children":845},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":847,"children":848},{},[849],{"type":109,"value":850},"एक मास की अवधि बीतने पर ऋषि काम-मोहित होकर राजमहल पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अत्यंत वृद्ध,\nअशक्त और कुरूप स्त्री को देखा। ऋषि ने चकित होकर उससे राजकुमारी का पता पूछा। वह स्त्री\nबोली, \"मैं ही वह राजकुमारी हूँ। यदि आप अभी भी मुझसे विवाह करना चाहते हैं, तो पहले इस कक्ष में मेरे साथ चलें।\"",{"type":65,"tag":93,"props":852,"children":853},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":855,"children":856},{},[857],{"type":109,"value":858},"वह उन्हें एक एकांत कक्ष में ले गई जहाँ से तीव्र दुर्गंध आ रही थी। वहाँ अनेक पात्रों में राजकुमारी के\nशरीर का मल, मूत्र, थूक, रक्त, पित्त और अन्य विजातीय तत्व रखे हुए थे। राजकुमारी ने गंभीर स्वर में कहा:\n\"हे महात्मन! जिस सौंदर्य पर आप मोहित होकर अपनी युगों की तपस्या को विस्मृत कर बैठे, वह इन्हीं\nअपवित्र वस्तुओं का एक सम्मिश्रण मात्र था। मैंने एक माह तक औषधि लेकर इन तत्वों को अपने शरीर से\nबाहर निकाला है। अब आप स्वयं ही विचार करें कि इस अस्थि-माँस के पुतले में ऐसा क्या था जो आपको\nअपनी साधना से श्रेष्ठ प्रतीत हुआ?\"",{"type":65,"tag":93,"props":860,"children":861},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":863,"children":864},{},[865],{"type":109,"value":866},"ऋषि को तत्काल बोध हो गया। यह 'अशुचिता' केवल देह की नहीं, अपितु 'असत' के प्रति हमारे 'अज्ञान' की है।\nउनके ज्ञान-चक्षु खुल गए और मोह का आवरण छिन्न-भिन्न हो गया। उन्होंने उस विदुषी कन्या को नमन किया, जो\nअब साक्षात ज्ञान स्वरूपा देवी सरस्वती के रूप में उनके समक्ष प्रकाशित हो रही थीं।\nराजकुमारी का उद्देश्य शरीर से घृणा करना नहीं, अपितु शरीर की नश्वरता को समझाकर ऋषि को उस 'सत' की ओर\nले जाना था जो इस देह का आधार है॥",{"type":65,"tag":93,"props":868,"children":869},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":871,"children":872},{},[873],{"type":109,"value":874},"यह कथा काम के परे जाने का मार्ग बताती है। काम के ऊपर भी एक सत है, किसी के लिए वह ब्रह्म है\nकिसी के लिए प्रकृति, किसी के लिए जीव, किसी के लिए आत्मा, किसी के लिए सत्य और किसी\nके लिए ईश्वर, किसी के लिए कुछ और। आपके लिए ये श्री, शक्ति या सरस्वती कुछ भी हो सकती है।\nआपको अपने काम को उचित दिशा देकर सत में लगाना होगा। काम ऊर्जा वास्तव में एक तटस्थ शक्ति है,\nजैसे अग्नि—जो भोजन भी पका सकती है और घर भी जला सकती है। जब हमारी यह ऊर्जा 'असत' (नश्वर वस्तुओं या देह)\nपर केंद्रित होती है, तो वह 'आसक्ति' बन जाती है, जो अंततः केवल रिक्तता और दुःख देती है क्योंकि वह\nआधार स्वयं अस्थिर है। परंतु, जब इसी ऊर्जा का प्रवाह 'सत' (शाश्वत सत्य, सृजन या लोक-कल्याण) की\nओर मोड़ दिया जाता है, तो वही कामना 'साधना' का रूप ले लेती है। सरल शब्दों में, जब तक इच्छा\n'पाने' (To possess) के लिए है, वह असत है, जब वही इच्छा 'होने' (To be) या 'सृजन करने'\nके लिए जागृत होती है, तो वह सत की ओर पहला कदम है॥",{"type":65,"tag":93,"props":876,"children":877},{},[],{"type":65,"tag":879,"props":880,"children":881},"ol",{},[882,892],{"type":65,"tag":608,"props":883,"children":884},{},[885,890],{"type":65,"tag":85,"props":886,"children":887},{},[888],{"type":109,"value":889},"सत -",{"type":109,"value":891}," वह जो उचित है, शाश्वत है, जो वास्तविक है॥",{"type":65,"tag":608,"props":893,"children":894},{},[895,900],{"type":65,"tag":85,"props":896,"children":897},{},[898],{"type":109,"value":899},"असत -",{"type":109,"value":901}," वह जो अनुचित है, नश्वर है, जो काल्पनिक है॥",{"type":65,"tag":93,"props":903,"children":904},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":906,"children":907},{},[908,910,915],{"type":109,"value":909},"शास्त्रों में एक उपाय है जिससे व्यक्ति स्वयं को समझ सकता है।\nशांति से ध्यान लगाकर अपने मन के विचारों को पहचानों। उन्हे रोको मत केवल चलने दो।\nजैसे कोई T.V चल रहा हो। ये ",{"type":65,"tag":85,"props":911,"children":912},{},[913],{"type":109,"value":914},"दृश्य-दृष्टा",{"type":109,"value":916}," का विवेक है हम इसे आगे फिर देखेंगे।\nशास्त्र कहता है: “दृश्या धीवृत्तयः साक्षी दृगेव न तु दृश्यते” — मन की वृत्तियाँ दृश्य हैं, आत्मा केवल साक्षी है।\nफिर उन इच्छाओं को चिन्हित करो, उनका मूल पहचानने का प्रयास करो, उन्हे\nवर्गिकित करो। देखो वह किस कारण उपजी, उसका मूल क्या था -",{"type":65,"tag":93,"props":918,"children":919},{},[],{"type":65,"tag":879,"props":921,"children":922},{},[923],{"type":65,"tag":608,"props":924,"children":925},{},[926,931,933],{"type":65,"tag":85,"props":927,"children":928},{},[929],{"type":109,"value":930},"इन्द्रियजन्य इच्छाएँ",{"type":109,"value":932}," — ",{"type":65,"tag":112,"props":934,"children":935},{},[936],{"type":109,"value":937},"रिरसा (स्वाद‑इच्छा), विवक्षा (कहने‑की‑इच्छा), शुश्रूषा (सुनने‑की‑इच्छा), दिदृक्षा (देखने‑की‑इच्छा), जिघ्रक्षा (सूँघने‑की‑इच्छा)",{"type":65,"tag":93,"props":939,"children":940},{},[],{"type":65,"tag":879,"props":942,"children":944},{"start":943},2,[945],{"type":65,"tag":608,"props":946,"children":947},{},[948,953,954],{"type":65,"tag":85,"props":949,"children":950},{},[951],{"type":109,"value":952},"देहजन्य आवश्यकताएँ",{"type":109,"value":932},{"type":65,"tag":112,"props":955,"children":956},{},[957],{"type":109,"value":958},"चिकित्सा (उपचार-इच्छा), क्षुधा (भूख), तृष्णा (प्यास\u002Fलोभ), लालसा (तीव्र‑इच्छा), लिप्सा (भोग‑इच्छा), अभिलाषा (मनोकामना), पिपासा (प्यास‑भाव), जिजीविषा (जीवन‑इच्छा)",{"type":65,"tag":93,"props":960,"children":961},{},[],{"type":65,"tag":879,"props":963,"children":965},{"start":964},3,[966],{"type":65,"tag":608,"props":967,"children":968},{},[969,974,975],{"type":65,"tag":85,"props":970,"children":971},{},[972],{"type":109,"value":973},"क्रियात्मक प्रवृत्तियाँ",{"type":109,"value":932},{"type":65,"tag":112,"props":976,"children":977},{},[978],{"type":109,"value":979},"युयुत्सा (युद्ध‑इच्छा), जिघांसा (हिंसा‑इच्छा), विजिगीषा (विजय‑इच्छा), सिसृक्षा (सृजन‑इच्छा)",{"type":65,"tag":93,"props":981,"children":982},{},[],{"type":65,"tag":879,"props":984,"children":986},{"start":985},4,[987],{"type":65,"tag":608,"props":988,"children":989},{},[990,995,996],{"type":65,"tag":85,"props":991,"children":992},{},[993],{"type":109,"value":994},"सांसारिक इच्छाएँ",{"type":109,"value":932},{"type":65,"tag":112,"props":997,"children":998},{},[999],{"type":109,"value":1000},"वित्तेषणा (धन‑इच्छा), पुत्रेषणा (सन्तान‑इच्छा), लोकेषणा (लोक‑इच्छा)",{"type":65,"tag":93,"props":1002,"children":1003},{},[],{"type":65,"tag":879,"props":1005,"children":1007},{"start":1006},5,[1008],{"type":65,"tag":608,"props":1009,"children":1010},{},[1011,1016,1017],{"type":65,"tag":85,"props":1012,"children":1013},{},[1014],{"type":109,"value":1015},"आध्यात्मिक आकांक्षाएँ",{"type":109,"value":932},{"type":65,"tag":112,"props":1018,"children":1019},{},[1020],{"type":109,"value":1021},"धर्मैषणा (धर्म-इच्छा), ब्रह्मैषणा (ब्रह्म-इच्छा), मुमुक्षा (मोक्ष‑इच्छा), तितिक्षा (सहन करने की इच्छा), प्सुपृक्षा (प्रश्न‑इच्छा), जिज्ञासा (ज्ञान‑इच्छा), मीमांसा (विचार‑अन्वेषण), उत्पिपठिषा (पढ़ने‑की‑इच्छा)",{"type":65,"tag":93,"props":1023,"children":1024},{},[],{"type":65,"tag":879,"props":1026,"children":1028},{"start":1027},6,[1029],{"type":65,"tag":608,"props":1030,"children":1031},{},[1032,1037,1038],{"type":65,"tag":85,"props":1033,"children":1034},{},[1035],{"type":109,"value":1036},"नकारात्मक इच्छाएँ",{"type":109,"value":932},{"type":65,"tag":112,"props":1039,"children":1040},{},[1041],{"type":109,"value":1042},"जुगुप्सा (घृणा‑इच्छा), दिधुक्षा (भस्म-इच्छा), जिहीर्षा (हरण-इच्छा), दिप्सा (दम्भ भरने की इच्छा), विवित्सा (तोड़ना\u002Fभेदना-इच्छा)",{"type":65,"tag":93,"props":1044,"children":1045},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1047,"children":1048},{},[1049],{"type":109,"value":1050},"फिर इन इच्छाओं का वर्गिकरण करके ये देखें की ये हैं क्या। इन वर्गों से आपको स्वयं को जानने का अवसर प्राप्त होगा।\nपुनः पुरुषार्थ पर वापस लौटते हैं। यह एक नीति कि पुस्तक है तो हम यहाँ केवल यथार्थ कर्म के विकल्पों पर ही बात करेंगे।\nपहले अपनी इच्छाएँ और विकल्पों को परखें और समझे कि वह किस प्रकार कि इच्छा है। ये तीन भेद को विस्तार से समझे\nइनके अंतर्गत ही आपका निर्णय सरल होगा॥ -",{"type":65,"tag":93,"props":1052,"children":1053},{},[],{"type":65,"tag":1055,"props":1056,"children":1058},"h3",{"id":1057},"_1-नित्य-अनित्य-permanence-स्थायित्व",[1059],{"type":109,"value":1060},"1. नित्य - अनित्य (Permanence - स्थायित्व) -",{"type":65,"tag":93,"props":1062,"children":1063},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":1065,"children":1067},{"className":1066},[99],[1068,1081,1094],{"type":65,"tag":102,"props":1069,"children":1070},{},[1071],{"type":65,"tag":81,"props":1072,"children":1073},{},[1074,1076],{"type":109,"value":1075},"नित्यवस्त्वेकं ब्रह्म तद्व्यतिरिक्तं सर्वमनित्यम्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1077,"children":1078},{},[1079],{"type":109,"value":1080},"नित्य वस्तु केवल ब्रह्म है, उसके अतिरिक्त सब कुछ अनित्य है।",{"type":65,"tag":102,"props":1082,"children":1083},{},[1084],{"type":65,"tag":81,"props":1085,"children":1086},{},[1087,1089],{"type":109,"value":1088},"अयमेव नित्यानित्यवस्तुविवेकः॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":1090,"children":1091},{},[1092],{"type":109,"value":1093},"यही नित्यानित्य वस्तु का विवेक है।",{"type":65,"tag":102,"props":1095,"children":1096},{},[1097],{"type":65,"tag":81,"props":1098,"children":1099},{},[1100],{"type":109,"value":1101},"— तत्त्वबोध (आदि शंकराचार्य)",{"type":65,"tag":93,"props":1103,"children":1104},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1106,"children":1107},{},[1108],{"type":109,"value":1109},"सभी विकल्पों में से उसे चुनों जो नित्य है जो स्थाई है। पूर्ण स्थाई ना सही परंतु दूसरे विकल्पों से\nअधिक स्थाई भी पर्याप्त है। जैसे सुंदरता से कौशल को वरियता देनी चाहिए और कौशल से ज्ञान को।\nजैसे पदवी अनित्य है परंतु कौशल और संबंध नित्य है, वे पदवी ना रहने के उपरांत भी रहेंगे।\nजैसे धन अनित्य है परंतु उसे अर्जित कर पाने का कौशल नित्य है। प्रोग्रामिंग लैंगवेजिस अनित्य\nहै परंतु 'लॉजिक' (तर्क), 'एल्गोरिदम' के आधारभूत सिद्धांत का ज्ञान 'नित्य' है। जैसे विश्लेषण के\nसॉफ्टवेयर अनित्य है परंतु 'सांख्यिकी' का ज्ञान नित्य है, ये हर जॉब में आपका सहयोग देगा।\nइसी प्रकार आप हर कार्य को नित्यानित्य में बाँट सकते हैं॥",{"type":65,"tag":93,"props":1111,"children":1112},{},[],{"type":65,"tag":1055,"props":1114,"children":1116},{"id":1115},"_2-भूमा-वामा-magnitude-विस्तार",[1117],{"type":109,"value":1118},"2. भूमा - वामा (Magnitude - विस्तार) -",{"type":65,"tag":93,"props":1120,"children":1121},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":1123,"children":1125},{"className":1124},[99],[1126,1139,1152],{"type":65,"tag":102,"props":1127,"children":1128},{},[1129],{"type":65,"tag":81,"props":1130,"children":1131},{},[1132,1134],{"type":109,"value":1133},"यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1135,"children":1136},{},[1137],{"type":109,"value":1138},"जहाँ कोई अन्य को नहीं देखता, अन्य को नहीं सुनता, अन्य को नहीं जानता—वह भूमा (अनन्त) है।",{"type":65,"tag":102,"props":1140,"children":1141},{},[1142],{"type":65,"tag":81,"props":1143,"children":1144},{},[1145,1147],{"type":109,"value":1146},"अथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम्॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":1148,"children":1149},{},[1150],{"type":109,"value":1151},"और जहाँ कोई अन्य को देखता है, अन्य को सुनता है, अन्य को जानता है—वह अल्प (सीमित) है।",{"type":65,"tag":102,"props":1153,"children":1154},{},[1155],{"type":65,"tag":81,"props":1156,"children":1157},{},[1158],{"type":109,"value":1159},"— छान्दोग्य उपनिषद् (अध्याय ७, खण्ड २४, मन्त्र १)",{"type":65,"tag":93,"props":1161,"children":1162},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1164,"children":1165},{},[1166],{"type":109,"value":1167},"हमारी इच्छाएँ दो प्रकार की होती हैं — कुछ हमें विस्तार और आत्मिक विकास की ओर ले जाती हैं (भूमा),\nऔर कुछ केवल प्रियता और आकर्षण की ओर खींचती हैं (वामा)। कुछ वस्तुएँ बहुत ही छोटी होती हैं आप\nउन्हे शीघ्रता से सीख सकते हैं। कुछ वस्तुओं को समझने में पूरी आयू कम पड़ती है। जैसे सैल्समैन बनना सरल है,\nपरंतु बी॰डी॰एम॰ बनना दीर्घसाध्य है — इसमें वर्षों का अनुभव और गहन रणनीतिक सोच चाहिए।\nबालगीत लिखना प्रिय और सहज है, परंतु राग‑रागिनी का ज्ञान गहन दीर्घसाध्य है — इसमें निरंतर अभ्यास और समय लगता है।\nएक छोटी कविता लिखना सरल है, परंतु काव्यशास्त्र और छन्दों का गहन अध्ययन करना दीर्घसाध्य है।\nएक सॉफ्टवेयर चलाना सरल है परंतु उसे बनाना जटिल और दीर्घसाध्य है। ये कार्य के अनुसार भी बदल\nसकता है। जैसे राग-रागिनी में एक छंदबद्ध गीत लिखना अधिक दीर्घसाध्य है इसके स्थान पर साधारण गीत\nलिखना आपको ख्याति दिला सकता है बहुत ही शीघ्रता से परंतु वह वामा है भूमा नहीं।",{"type":65,"tag":93,"props":1169,"children":1170},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1172,"children":1173},{},[1174],{"type":109,"value":1175},"ऐसी ही कुछ गीत अमर हो जाते हैं, कुछ काव्य अमर हो जाते हैं, कुछ नृत्य, कुछ परिधान,\nकुछ वेष-भूषाएँ, कुछ पकवान, कुछ कलाकृतियाँ अमर हो जाती हैं। हर मार्ग पर एक\nकुमार्ग (शॉर्टकट - अल्पकालिक प्रलोभन) होता है और एक कठिनाई वाला पूर्ण मार्ग।\nहमेशा पूर्ण मार्ग को चुने जीवन में रसानंद लेने का भी एक उचित मार्ग है।\nइस प्रकार भूमा-वामा का भेद हर काम (इच्छा) में समझ आना चाहिए॥",{"type":65,"tag":93,"props":1177,"children":1178},{},[],{"type":65,"tag":1055,"props":1180,"children":1182},{"id":1181},"_3-श्रेय-प्रेय-road-मार्ग",[1183],{"type":109,"value":1184},"3. श्रेय - प्रेय (Road - मार्ग) -",{"type":65,"tag":93,"props":1186,"children":1187},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":1189,"children":1191},{"className":1190},[99],[1192,1205,1218],{"type":65,"tag":102,"props":1193,"children":1194},{},[1195],{"type":65,"tag":81,"props":1196,"children":1197},{},[1198,1200],{"type":109,"value":1199},"अन्यच्छ्रेयो अन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1201,"children":1202},{},[1203],{"type":109,"value":1204},"श्रेय (परम कल्याण) और प्रेय (सांसारिक सुख) दोनों अलग-अलग हैं। ये दोनों भिन्न प्रयोजनों वाले होकर मनुष्य को अपनी ओर खींचते हैं।",{"type":65,"tag":102,"props":1206,"children":1207},{},[1208],{"type":65,"tag":81,"props":1209,"children":1210},{},[1211,1213],{"type":109,"value":1212},"तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":1214,"children":1215},{},[1216],{"type":109,"value":1217},"इन दोनों में से जो श्रेय मार्ग को चुनता है, उसका कल्याण होता है, किन्तु जो केवल प्रिय (प्रेय) को चुनता है, वह जीवन के वास्तविक लक्ष्य से चूक जाता है॥",{"type":65,"tag":102,"props":1219,"children":1220},{},[1221],{"type":65,"tag":81,"props":1222,"children":1223},{},[1224],{"type":109,"value":1225},"— कठोपनिषद् (1.2.1)",{"type":65,"tag":93,"props":1227,"children":1228},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1230,"children":1231},{},[1232],{"type":109,"value":1233},"संसार में कोई भी कार्य हो उसके न्यूनतम दो उद्देश्य होते हैं — एक तो वह कार्य जो हमें\nवास्तविक कल्याण (श्रेय) की ओर ले जाता है, और दूसरा वह जो केवल सांसारिक सुख (प्रेय) प्रदान करता है।\nआपको किसी भी प्रकार की कार्य सिद्धि करनी हो। आईएएस बनना हो, व्यवसाय करना हो,\nकलाकार, खिलाड़ी या कुछ और भी तो भी आप हर कार्य में एक क्षण बैठ कर ये सोचें की क्या आप\nजो कार्य कर रहे हैं वह श्रेय है या प्रेय। आप उसे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह आपको\nअपने उद्देश्य की ओर ले जाएगा या आप इंद्रिय सुख के लिए मात्र कर रहे हैं। उदाहरण के लिए यदि\nआप प्रातःकाल उठकर व्यायाम, ध्यान, स्वाध्याय करते हैं तो वह श्रेय है यदि आप फोन\nचलाने लगते हैं या टीवी देखने लगते हैं तो वह प्रेय है। प्रेय की भी अपनी जगह है, परंतु हम\nअधिक प्रेय वस्तुओं में लिप्त नहीं हो सकते हैं यदि हम कोई उद्देश्यपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं॥",{"type":65,"tag":93,"props":1235,"children":1236},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1238,"children":1239},{},[1240],{"type":109,"value":1241},"एक ही वस्तु कहीं श्रेय तो कहीं प्रेय हो सकती है। मदिरा का भोग प्रेय है परंतु उससे दवा बनाना श्रेय है।\nसंगीत अधिकतर प्रेय है परंतु प्रभू समर्पित छंदोबद्ध रागाधारित कृति (भजन) गाना श्रेय है।\nइस प्रकार कार्य और उद्देश्य ये निर्धारित करेगा की क्या श्रेय है और क्या प्रेय।\nकाम केवल शारीरिक या बौद्धिक नहीं है, यह भावनात्मक भी है। सहानुभूति, करुणा और प्रेम\nभी काम के परिष्कृत रूप हैं। 'प्रेय' मार्ग पर प्रेम 'स्वार्थ' होता है, जबकि 'श्रेय' मार्ग पर वही\nप्रेम 'सेवा' बन जाता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1243,"children":1244},{},[],{"type":65,"tag":879,"props":1246,"children":1247},{},[1248],{"type":65,"tag":608,"props":1249,"children":1250},{},[1251,1256],{"type":65,"tag":85,"props":1252,"children":1253},{},[1254],{"type":109,"value":1255},"श्रेय (परम कल्याण) -",{"type":109,"value":1257}," वह कार्य जो हमें वास्तविक कल्याण, स्थायित्व, और\nआत्म-संतुष्टि की ओर ले जाता है। यह दीर्घकालिक और स्थायी सुख प्रदान करता है।\nउदाहरण के लिए, शिक्षा, स्वास्थ्य, नैतिक व्यवसाय, और समाज सेवा श्रेय के कार्य हैं।",{"type":65,"tag":93,"props":1259,"children":1260},{},[],{"type":65,"tag":879,"props":1262,"children":1263},{"start":943},[1264],{"type":65,"tag":608,"props":1265,"children":1266},{},[1267,1272],{"type":65,"tag":85,"props":1268,"children":1269},{},[1270],{"type":109,"value":1271},"प्रेय (सांसारिक सुख) -",{"type":109,"value":1273}," वह कार्य जो केवल तात्कालिक और इंद्रिय सुख प्रदान करता है,\nलेकिन वास्तविक कल्याण की ओर नहीं ले जाता। यह अस्थायी और\nकभी-कभी हानिकारक भी हो सकता है।",{"type":65,"tag":93,"props":1275,"children":1276},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1278,"children":1279},{},[1280],{"type":109,"value":1281},"इस लिए सदा ये प्रश्न पूछते रहें कि क्या ये सत है या असत। इसके लिए उसे 3 स्तर पर देखें",{"type":65,"tag":93,"props":1283,"children":1284},{},[],{"type":65,"tag":879,"props":1286,"children":1287},{},[1288,1298,1308],{"type":65,"tag":608,"props":1289,"children":1290},{},[1291,1296],{"type":65,"tag":85,"props":1292,"children":1293},{},[1294],{"type":109,"value":1295},"नित्य - अनित्य (Permanence - स्थायित्व) -",{"type":109,"value":1297}," सदा शाश्वत मार्ग को चुनों",{"type":65,"tag":608,"props":1299,"children":1300},{},[1301,1306],{"type":65,"tag":85,"props":1302,"children":1303},{},[1304],{"type":109,"value":1305},"भूमा - वामा (Magnitude - विस्तार) -",{"type":109,"value":1307}," सदा दीर्घसाध्य मार्ग को चुनों",{"type":65,"tag":608,"props":1309,"children":1310},{},[1311,1316],{"type":65,"tag":85,"props":1312,"children":1313},{},[1314],{"type":109,"value":1315},"श्रेय - प्रेय (Road - मार्ग) -",{"type":109,"value":1317}," सदा कल्याणकारी मार्ग को चुनों",{"type":65,"tag":93,"props":1319,"children":1320},{},[],{"type":65,"tag":1322,"props":1323,"children":1325},"swar-lipi",{":is-notation":1324},"false",[1326],{"type":65,"tag":1327,"props":1328,"children":1329},"table",{},[1330,1355],{"type":65,"tag":1331,"props":1332,"children":1333},"thead",{},[1334],{"type":65,"tag":1335,"props":1336,"children":1337},"tr",{},[1338,1345,1350],{"type":65,"tag":1339,"props":1340,"children":1342},"th",{"align":1341},"left",[1343],{"type":109,"value":1344},"सूत्र",{"type":65,"tag":1339,"props":1346,"children":1347},{"align":1341},[1348],{"type":109,"value":1349},"असत (त्याज्य )",{"type":65,"tag":1339,"props":1351,"children":1352},{"align":1341},[1353],{"type":109,"value":1354},"सत (ग्राह्य)",{"type":65,"tag":1356,"props":1357,"children":1358},"tbody",{},[1359,1372,1393,1414],{"type":65,"tag":1335,"props":1360,"children":1361},{},[1362,1366,1369],{"type":65,"tag":1363,"props":1364,"children":1365},"td",{"align":1341},[],{"type":65,"tag":1363,"props":1367,"children":1368},{"align":1341},[],{"type":65,"tag":1363,"props":1370,"children":1371},{"align":1341},[],{"type":65,"tag":1335,"props":1373,"children":1374},{},[1375,1383,1388],{"type":65,"tag":1363,"props":1376,"children":1377},{"align":1341},[1378],{"type":65,"tag":85,"props":1379,"children":1380},{},[1381],{"type":109,"value":1382},"नित्य-अनित्य",{"type":65,"tag":1363,"props":1384,"children":1385},{"align":1341},[1386],{"type":109,"value":1387},"पद, वेतन, सोशल मीडिया लाइक्स",{"type":65,"tag":1363,"props":1389,"children":1390},{"align":1341},[1391],{"type":109,"value":1392},"तर्क, मानवीय मूल्य, लोक कल्याण",{"type":65,"tag":1335,"props":1394,"children":1395},{},[1396,1404,1409],{"type":65,"tag":1363,"props":1397,"children":1398},{"align":1341},[1399],{"type":65,"tag":85,"props":1400,"children":1401},{},[1402],{"type":109,"value":1403},"भूमा-वामा",{"type":65,"tag":1363,"props":1405,"children":1406},{"align":1341},[1407],{"type":109,"value":1408},"शॉर्टकट कोर्स, सतही जानकारी",{"type":65,"tag":1363,"props":1410,"children":1411},{"align":1341},[1412],{"type":109,"value":1413},"गहन शोध, शास्त्रीय ज्ञान, दीर्घकालिक लक्ष्य",{"type":65,"tag":1335,"props":1415,"children":1416},{},[1417,1425,1430],{"type":65,"tag":1363,"props":1418,"children":1419},{"align":1341},[1420],{"type":65,"tag":85,"props":1421,"children":1422},{},[1423],{"type":109,"value":1424},"श्रेय-प्रेय",{"type":65,"tag":1363,"props":1426,"children":1427},{"align":1341},[1428],{"type":109,"value":1429},"आलस्य, मनोरंजन (Scrolling), दीर्घसूत्रता",{"type":65,"tag":1363,"props":1431,"children":1432},{"align":1341},[1433],{"type":109,"value":1434},"अनुशासन, स्वाध्याय, स्वास्थ्य",{"type":65,"tag":93,"props":1436,"children":1437},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1439,"children":1440},{},[1441],{"type":109,"value":1442},"ये हर सांसारिक वस्तु पे काम करेगा। और ये सूत्र आपको मोह में पड़ने से भी बचाएगा और\nआपकी काम ऊर्जा को उचित दिशा देकर आपको सफलता के सोपान पर भी चढ़ा देगा।\nइसलिए, जब भी मन विचलित हो, स्वयं से पूछें कि क्या मैं किसी ऐसी चीज़ के पीछे भाग रहा हूँ जो कल नहीं रहेगी?\nसत को चुनना ही बुद्धिमानी है, क्योंकि जो टिकता नहीं, वह सुख भी स्थायी नहीं दे सकता।\nआज आपके पास जो कुछ भी है—आपका पद, आपका ज्ञान या आपकी संपत्ति—उसमें से वह\nक्या है जो आपके चले जाने के बाद भी 'सत' रूप में जीवित रहेगा?\"\nजैसे एक जटिल एल्गोरिदम का निर्माण केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं, अपितु तार्किक सौंदर्य (Logical Beauty)\nका सृजन है—यही बौद्धिक 'काम' है। उसी प्रकार आप भी अपने काम को दिशा दो॥",{"type":65,"tag":93,"props":1444,"children":1445},{},[],{"type":65,"tag":162,"props":1447,"children":1449},{"id":1448},"उपसंहार-पुरुषार्थ-काम",[1450],{"type":109,"value":1451},"॥ उपसंहार: पुरुषार्थ (काम) ॥",{"type":65,"tag":93,"props":1453,"children":1454},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":1456,"children":1458},{"className":1457},[99],[1459,1475,1491],{"type":65,"tag":102,"props":1460,"children":1461},{},[1462],{"type":65,"tag":81,"props":1463,"children":1464},{},[1465,1467,1470],{"type":109,"value":1466},"स यो ह वै तत्परं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति",{"type":65,"tag":93,"props":1468,"children":1469},{},[],{"type":65,"tag":112,"props":1471,"children":1472},{},[1473],{"type":109,"value":1474},"जो उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है।",{"type":65,"tag":102,"props":1476,"children":1477},{},[1478],{"type":65,"tag":81,"props":1479,"children":1480},{},[1481,1483,1486],{"type":109,"value":1482},"आप्तकामो ह्यस्मिन्नेवात्मनि सर्वकामः",{"type":65,"tag":93,"props":1484,"children":1485},{},[],{"type":65,"tag":112,"props":1487,"children":1488},{},[1489],{"type":109,"value":1490},"वह आत्मा में ही सभी कामनाओं को पूर्ण मानकर, कामनारहित और संतुष्ट (आप्तकाम) हो जाता है।",{"type":65,"tag":102,"props":1492,"children":1493},{},[1494],{"type":65,"tag":81,"props":1495,"children":1496},{},[1497],{"type":109,"value":1498},"— मुण्डकोपनिषद् (३.२.९)",{"type":65,"tag":93,"props":1500,"children":1501},{},[],{"type":65,"tag":144,"props":1503,"children":1504},{},[],{"type":65,"tag":93,"props":1506,"children":1507},{},[],{"type":65,"tag":604,"props":1509,"children":1510},{},[1511],{"type":65,"tag":608,"props":1512,"children":1513},{},[1514,1519],{"type":65,"tag":85,"props":1515,"children":1516},{},[1517],{"type":109,"value":1518},"संभोग से समाधि (Evolution of Desire) -",{"type":65,"tag":604,"props":1520,"children":1521},{},[1522,1527,1532,1537,1542],{"type":65,"tag":608,"props":1523,"children":1524},{},[1525],{"type":109,"value":1526},"काम ऊर्जा अशुद्ध नहीं है, यह सृष्टि का मूल बीज है। ऋग्वेद और गीता के प्रमाणों से सिद्ध है कि\nधर्मसम्मत काम स्वयं ईश्वर का रूप है।",{"type":65,"tag":608,"props":1528,"children":1529},{},[1530],{"type":109,"value":1531},"सृष्टि का सृजन असत रूपी काम से हुआ और जन्म मरण का बंधन भी काम की देन है।",{"type":65,"tag":608,"props":1533,"children":1534},{},[1535],{"type":109,"value":1536},"जीवन व्यक्ति को रसानंद लेने के लिए मिलता है। रस प्रभू का रूप हैं।",{"type":65,"tag":608,"props":1538,"children":1539},{},[1540],{"type":109,"value":1541},"'संभोग' केवल प्रजनन नहीं, अपितु पितृ-ऋण से मुक्ति और 'ऋत' (सत्य\u002Fनियम) का निर्वहन है।",{"type":65,"tag":608,"props":1543,"children":1544},{},[1545],{"type":109,"value":1546},"वासना का दमन (Suppression) मानसिक विकृति लाता है, जबकि उसका अनुभव और\nउदात्तीकरण (Sublimation) 'भुक्ति से मुक्ति' या समाधि का मार्ग प्रशस्त करता है (जैसे गोरखनाथ के शिष्य की कथा)।",{"type":65,"tag":93,"props":1548,"children":1549},{},[],{"type":65,"tag":604,"props":1551,"children":1552},{},[1553],{"type":65,"tag":608,"props":1554,"children":1555},{},[1556,1561],{"type":65,"tag":85,"props":1557,"children":1558},{},[1559],{"type":109,"value":1560},"कर्म की त्रिवेणी (Three Facets of Action) -",{"type":65,"tag":604,"props":1562,"children":1563},{},[1564,1573,1582],{"type":65,"tag":608,"props":1565,"children":1566},{},[1567,1571],{"type":65,"tag":85,"props":1568,"children":1569},{},[1570],{"type":109,"value":615},{"type":109,"value":1572}," फल की इच्छा के साथ किए गए शुभ कार्य।",{"type":65,"tag":608,"props":1574,"children":1575},{},[1576,1580],{"type":65,"tag":85,"props":1577,"children":1578},{},[1579],{"type":109,"value":625},{"type":109,"value":1581}," पतन की ओर ले जाने वाले निषिद्ध कर्म।",{"type":65,"tag":608,"props":1583,"children":1584},{},[1585,1589],{"type":65,"tag":85,"props":1586,"children":1587},{},[1588],{"type":109,"value":635},{"type":109,"value":1590}," कर्मयोग की पराकाष्ठा, जहाँ कर्म करते हुए भी फल के प्रति अनासक्ति रहती है।\nयही 'काम-वासना' को 'काम-योग' में बदलता है।",{"type":65,"tag":93,"props":1592,"children":1593},{},[],{"type":65,"tag":604,"props":1595,"children":1596},{},[1597],{"type":65,"tag":608,"props":1598,"children":1599},{},[1600,1605],{"type":65,"tag":85,"props":1601,"children":1602},{},[1603],{"type":109,"value":1604},"इच्छाओं का सूक्ष्म वर्गीकरण (Categorization of Desires) -",{"type":65,"tag":604,"props":1606,"children":1607},{},[1608,1613],{"type":65,"tag":608,"props":1609,"children":1610},{},[1611],{"type":109,"value":1612},"साधक को अपनी इच्छाओं को पहचानना चाहिए: जैसे दिदृक्षा, शुश्रूषा, क्षुधा, जिजीविषा, सिसृक्षा, मुमुक्षा, जिज्ञासा इत्यादि।",{"type":65,"tag":608,"props":1614,"children":1615},{},[1616],{"type":109,"value":1617},"नकारात्मक इच्छाओं (जैसे जुगुप्सा, जिघांसा) को पहचानकर उनका त्याग आवश्यक है।",{"type":65,"tag":93,"props":1619,"children":1620},{},[],{"type":65,"tag":604,"props":1622,"children":1623},{},[1624],{"type":65,"tag":608,"props":1625,"children":1626},{},[1627,1632],{"type":65,"tag":85,"props":1628,"children":1629},{},[1630],{"type":109,"value":1631},"विवेक के तीन व्यावहारिक सूत्र (The Triple Filter of Discernment) -",{"type":65,"tag":879,"props":1633,"children":1634},{},[1635,1645,1655],{"type":65,"tag":608,"props":1636,"children":1637},{},[1638,1643],{"type":65,"tag":85,"props":1639,"children":1640},{},[1641],{"type":109,"value":1642},"नित्य - अनित्य (Permanence) -",{"type":109,"value":1644}," क्षणभंगुर (पद, वेतन) के स्थान पर शाश्वत (तर्क, कौशल, मानवीय मूल्य) का चयन करना।",{"type":65,"tag":608,"props":1646,"children":1647},{},[1648,1653],{"type":65,"tag":85,"props":1649,"children":1650},{},[1651],{"type":109,"value":1652},"भूमा - वामा (Magnitude) -",{"type":109,"value":1654}," अल्पकालिक प्रलोभनों (वामा) के बजाय विस्तार और गहन विशेषज्ञता (भूमा) वाले कठिन मार्ग को चुनना।",{"type":65,"tag":608,"props":1656,"children":1657},{},[1658,1663],{"type":65,"tag":85,"props":1659,"children":1660},{},[1661],{"type":109,"value":1662},"श्रेय - प्रेय (The Road) -",{"type":109,"value":1664}," केवल प्रिय लगने वाले (प्रेय) कार्यों के स्थान पर वास्तविक आत्म-कल्याण (श्रेय) करने वाले कार्यों को प्राथमिकता देना।",{"type":65,"tag":93,"props":1666,"children":1667},{},[],{"type":65,"tag":604,"props":1669,"children":1670},{},[1671],{"type":65,"tag":608,"props":1672,"children":1673},{},[1674,1679],{"type":65,"tag":85,"props":1675,"children":1676},{},[1677],{"type":109,"value":1678},"दृश्य-दृष्टा विवेक -",{"type":65,"tag":604,"props":1680,"children":1681},{},[1682],{"type":65,"tag":608,"props":1683,"children":1684},{},[1685],{"type":109,"value":1686},"मन की वृत्तियाँ 'दृश्य' हैं और आप 'साक्षी' (Observer) हैं। इस तटस्थता से ही काम ऊर्जा को सही दिशा दी जा सकती है।",{"type":65,"tag":93,"props":1688,"children":1689},{},[],{"type":65,"tag":144,"props":1691,"children":1692},{},[],{"type":65,"tag":93,"props":1694,"children":1695},{},[],{"type":65,"tag":1322,"props":1697,"children":1698},{":is-notation":1324},[1699],{"type":65,"tag":1327,"props":1700,"children":1701},{},[1702,1723],{"type":65,"tag":1331,"props":1703,"children":1704},{},[1705],{"type":65,"tag":1335,"props":1706,"children":1707},{},[1708,1713,1718],{"type":65,"tag":1339,"props":1709,"children":1710},{"align":1341},[1711],{"type":109,"value":1712},"सूत्र (Principle)",{"type":65,"tag":1339,"props":1714,"children":1715},{"align":1341},[1716],{"type":109,"value":1717},"करने योग्य कार्य (Actionable Insight)",{"type":65,"tag":1339,"props":1719,"children":1720},{"align":1341},[1721],{"type":109,"value":1722},"मूल मंत्र (Key Takeaway)",{"type":65,"tag":1356,"props":1724,"children":1725},{},[1726,1738,1761,1784,1807,1830,1853,1876],{"type":65,"tag":1335,"props":1727,"children":1728},{},[1729,1732,1735],{"type":65,"tag":1363,"props":1730,"children":1731},{"align":1341},[],{"type":65,"tag":1363,"props":1733,"children":1734},{"align":1341},[],{"type":65,"tag":1363,"props":1736,"children":1737},{"align":1341},[],{"type":65,"tag":1335,"props":1739,"children":1740},{},[1741,1751,1756],{"type":65,"tag":1363,"props":1742,"children":1743},{"align":1341},[1744,1746],{"type":109,"value":1745},"१. ",{"type":65,"tag":85,"props":1747,"children":1748},{},[1749],{"type":109,"value":1750},"ऊर्जा का रूपांतरण",{"type":65,"tag":1363,"props":1752,"children":1753},{"align":1341},[1754],{"type":109,"value":1755},"'पाने' (To Possess) वाली कामनाओं के स्थान पर 'सृजन' (To Create) की कामना श्रेष्ठ हैं।",{"type":65,"tag":1363,"props":1757,"children":1758},{"align":1341},[1759],{"type":109,"value":1760},"\"संग्रह 'असत' है, सृजन 'सत' है।\"",{"type":65,"tag":1335,"props":1762,"children":1763},{},[1764,1774,1779],{"type":65,"tag":1363,"props":1765,"children":1766},{"align":1341},[1767,1769],{"type":109,"value":1768},"२. ",{"type":65,"tag":85,"props":1770,"children":1771},{},[1772],{"type":109,"value":1773},"नित्यानित्य विवेक",{"type":65,"tag":1363,"props":1775,"children":1776},{"align":1341},[1777],{"type":109,"value":1778},"चुनाव करते समय उसे प्राथमिकता दें जो स्थाई है।",{"type":65,"tag":1363,"props":1780,"children":1781},{"align":1341},[1782],{"type":109,"value":1783},"\"जो टिकता नहीं, वह सुख भी स्थाई नहीं देता।\"",{"type":65,"tag":1335,"props":1785,"children":1786},{},[1787,1797,1802],{"type":65,"tag":1363,"props":1788,"children":1789},{"align":1341},[1790,1792],{"type":109,"value":1791},"३. ",{"type":65,"tag":85,"props":1793,"children":1794},{},[1795],{"type":109,"value":1796},"भूमा का चुनाव",{"type":65,"tag":1363,"props":1798,"children":1799},{"align":1341},[1800],{"type":109,"value":1801},"शॉर्टकट (वामा) के लालच से बचें। किसी भी विषय की गहन विशेषज्ञता (Deep Mastery) का कठिन मार्ग चुनें।",{"type":65,"tag":1363,"props":1803,"children":1804},{"align":1341},[1805],{"type":109,"value":1806},"\"भूमा (विस्तार) ही सुख है, अल्प में सुख नहीं।\"",{"type":65,"tag":1335,"props":1808,"children":1809},{},[1810,1820,1825],{"type":65,"tag":1363,"props":1811,"children":1812},{"align":1341},[1813,1815],{"type":109,"value":1814},"४. ",{"type":65,"tag":85,"props":1816,"children":1817},{},[1818],{"type":109,"value":1819},"श्रेय बनाम प्रेय",{"type":65,"tag":1363,"props":1821,"children":1822},{"align":1341},[1823],{"type":109,"value":1824},"हर निर्णय पर पूछें: यह केवल मनोरंजन (प्रेय) है या मेरा कल्याण (श्रेय) करेगा?",{"type":65,"tag":1363,"props":1826,"children":1827},{"align":1341},[1828],{"type":109,"value":1829},"\"सुखद मार्ग फिसलन भरा है, कल्याणकारी मार्ग ठोस है।\"",{"type":65,"tag":1335,"props":1831,"children":1832},{},[1833,1843,1848],{"type":65,"tag":1363,"props":1834,"children":1835},{"align":1341},[1836,1838],{"type":109,"value":1837},"५. ",{"type":65,"tag":85,"props":1839,"children":1840},{},[1841],{"type":109,"value":1842},"अकर्म का अभ्यास",{"type":65,"tag":1363,"props":1844,"children":1845},{"align":1341},[1846],{"type":109,"value":1847},"कार्य को 'फल' की लालसा से चिपक कर नहीं, अपितु एक साधना या कर्तव्य मानकर पूर्ण निष्ठा से करें।",{"type":65,"tag":1363,"props":1849,"children":1850},{"align":1341},[1851],{"type":109,"value":1852},"\"कर्म से मत भागो, कर्म के फल की 'आसक्ति' से भागो।\"",{"type":65,"tag":1335,"props":1854,"children":1855},{},[1856,1866,1871],{"type":65,"tag":1363,"props":1857,"children":1858},{"align":1341},[1859,1861],{"type":109,"value":1860},"६. ",{"type":65,"tag":85,"props":1862,"children":1863},{},[1864],{"type":109,"value":1865},"रसानंद आवश्यक है",{"type":65,"tag":1363,"props":1867,"children":1868},{"align":1341},[1869],{"type":109,"value":1870},"नश्वरता (असत) को पहचानें. आधार (आत्मा\u002Fसत्य) से जुड़ें।",{"type":65,"tag":1363,"props":1872,"children":1873},{"align":1341},[1874],{"type":109,"value":1875},"\"रस (तत्व) शाश्वत है।\"",{"type":65,"tag":1335,"props":1877,"children":1878},{},[1879,1889,1894],{"type":65,"tag":1363,"props":1880,"children":1881},{"align":1341},[1882,1884],{"type":109,"value":1883},"७. ",{"type":65,"tag":85,"props":1885,"children":1886},{},[1887],{"type":109,"value":1888},"गृहस्थ धर्म",{"type":65,"tag":1363,"props":1890,"children":1891},{"align":1341},[1892],{"type":109,"value":1893},"काम का दमन न करें, उसे मर्यादा (धर्म) के भीतर रहकर पितृ-ऋण उतारने और सृजन का साधन बनाएं।",{"type":65,"tag":1363,"props":1895,"children":1896},{"align":1341},[1897],{"type":109,"value":1898},"\"दमन विकृति है, नियमन (संयम) प्रगति है।\"",{"type":65,"tag":93,"props":1900,"children":1901},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1903,"children":1904},{},[1905],{"type":109,"value":1906},"आज आपके पास मौजूद 5 चीज़ों की सूची बनाएँ और देखें कि उनमें से कौन सी 'सत' है और कौन सी 'असत'?\nअपने कौशलों की भी सूची बनाकर देखें कि उनमें से कौन सा सत है और सा असत।\nइससे आपको अपने जीवन में तत्कालिक प्रभाव देखने को मिलेंगे। आप जो भी कर्म कर रहे हैं एक बार ये देखें कि क्या वह -",{"type":65,"tag":93,"props":1908,"children":1909},{},[],{"type":65,"tag":879,"props":1911,"children":1912},{},[1913,1918,1923],{"type":65,"tag":608,"props":1914,"children":1915},{},[1916],{"type":109,"value":1917},"आपको अपने कर्म में प्रेम हैं।",{"type":65,"tag":608,"props":1919,"children":1920},{},[1921],{"type":109,"value":1922},"आपको अपने कर्मफल पे आसक्ति है कि नहीं।",{"type":65,"tag":608,"props":1924,"children":1925},{},[1926],{"type":109,"value":1927},"आपका प्रतिफल (कृति) कितना नित्य है।",{"type":65,"tag":93,"props":1929,"children":1930},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1932,"children":1933},{},[1934],{"type":109,"value":1935},"प्रभु आपको एक रसमय जीवन दें और आपकी समस्त कामनाएँ पूरीं करें। आशा करता हूँ की आप अपने\nकाम को उचित दिशा देना सीख जाएँगे॥",{"title":54,"searchDepth":943,"depth":943,"links":1937},[1938,1939,1940,1941,1942,1947],{"id":164,"depth":943,"text":167},{"id":350,"depth":943,"text":350},{"id":453,"depth":943,"text":453},{"id":559,"depth":943,"text":562},{"id":729,"depth":943,"text":732,"children":1943},[1944,1945,1946],{"id":1057,"depth":964,"text":1060},{"id":1115,"depth":964,"text":1118},{"id":1181,"depth":964,"text":1184},{"id":1448,"depth":943,"text":1451},"markdown","content:shiksha:vedicJeevan:9.atmajnaan_08_purushartha_kaam.md","content","shiksha\u002FvedicJeevan\u002F9.atmajnaan_08_purushartha_kaam.md","shiksha\u002FvedicJeevan\u002F9.atmajnaan_08_purushartha_kaam","md",1783865536481]