[{"data":1,"prerenderedAt":1010},["ShallowReactive",2],{"content-\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_06_purushartha_dharm":3,"content-query-nWCI0e4AY1":51},[4,12,17,21,25,29,33,37,41,45,49],{"_path":5,"title":6,"description":7,"part":8,"image":9,"prev_path":10,"next_path":11},"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fintro_01_intro","॥ परिचय ॥","यहाँ हम वैदिक दृष्टि से जीवन को समझने का प्रयास करेंगे। हम यहाँ कई सूत्रों को जोड़कर जीवन में सफल होने के उपाय ढूँढेंगे॥\n","॥ प्रस्तावना ॥","\u002Fimages\u002Fshiksha\u002Fjeevan_darshan.jpeg",null,"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_01_tripakshiyavivek",{"_path":11,"title":13,"description":14,"part":15,"image":9,"prev_path":5,"next_path":16},"॥ तृतीय मार्ग ॥","ज्ञान की परिक्षा का तीसरा मार्ग। बिना जिसके ज्ञान को प्रमाणित करना कठिन है॥\n","॥ आत्मज्ञान ॥","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_02_jnaan",{"_path":16,"title":18,"description":19,"part":15,"image":9,"prev_path":11,"next_path":20},"॥ ज्ञान ॥","ज्ञान से विद्या तक। व्यावहारिक अधिगम के प्राचीन चरण। यह स्पष्ट करता है कि कैसे सतही ज्ञान को जीवन का अंग बनाया जाता है॥","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_03_chittvijnaan",{"_path":20,"title":22,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":16,"next_path":24},"॥ चित्तविज्ञान ॥","पुरुषार्थ का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_04_varnn",{"_path":24,"title":26,"description":27,"part":15,"image":9,"prev_path":20,"next_path":28},"॥ चतुर्वण ॥","चतुर्वर्ण की तार्किक समीक्षा: अष्टलक्ष्मी, अष्टसरस्वती और एकादश शक्ति के माध्यम से समझिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का वास्तविक स्वरूप। प्राचीन दर्शन का आधुनिक विश्लेषण॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_05_ashram",{"_path":28,"title":30,"description":31,"part":15,"image":9,"prev_path":24,"next_path":32},"॥ आश्रम ॥","वर्णाश्रम की तार्किक समीक्षा और महत्व॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_06_purushartha_dharm",{"_path":32,"title":34,"description":35,"part":15,"image":9,"prev_path":28,"next_path":36},"॥ पुरुषार्थ (धर्म)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से धर्म की व्याख्या और धर्म परायण होने के लिए एक सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_07_purushartha_arth",{"_path":36,"title":38,"description":39,"part":15,"image":9,"prev_path":32,"next_path":40},"॥ पुरुषार्थ (अर्थ) ॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से अर्थ की व्याख्या और अर्थार्जन के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_08_purushartha_kaam",{"_path":40,"title":42,"description":43,"part":15,"image":9,"prev_path":36,"next_path":44},"॥ पुरुषार्थ (काम)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से काम का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_09_purushartha_moksha",{"_path":44,"title":46,"description":47,"part":15,"image":9,"prev_path":40,"next_path":48},"॥ पुरुषार्थ (मोक्ष)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से मोक्ष का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र।\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_10_purushartha_nishkarsha",{"_path":48,"title":50,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":44,"next_path":10},"॥ पुरुषार्थ (निष्कर्ष) ॥",{"_path":32,"_dir":52,"_draft":53,"_partial":53,"_locale":54,"title":34,"description":35,"navigation":55,"part":15,"author":56,"image":9,"tag":57,"body":61,"_type":1004,"_id":1005,"_source":1006,"_file":1007,"_stem":1008,"_extension":1009},"vedicjeevan",false,"",true,"Vikram Singh Rawat",[58,59,60],"literature","book","jeevandarshan",{"type":62,"children":63,"toc":998},"root",[64,74,92,96,126,129,133,136,144,147,152,155,167,170,175,178,185,188,193,196,222,225,230,233,238,241,253,256,262,265,291,294,299,302,321,324,329,332,376,379,443,446,506,509,515,518,533,536,562,565,570,603,608,611,614,617,623,626,640,643,656,659,705,708,721,724,744,747,790,793,796,799,809,812,961,964,969,972,990,993],{"type":65,"tag":66,"props":67,"children":68},"element","h1",{"id":54},[69],{"type":65,"tag":70,"props":71,"children":73},"binding",{"value":72},"$doc.title",[],{"type":65,"tag":75,"props":76,"children":79},"div",{"className":77},[78],"sub_heading",[80],{"type":65,"tag":81,"props":82,"children":83},"p",{},[84],{"type":65,"tag":85,"props":86,"children":87},"strong",{},[88],{"type":65,"tag":70,"props":89,"children":91},{"value":90},"$doc.description",[],{"type":65,"tag":93,"props":94,"children":95},"br",{},[],{"type":65,"tag":75,"props":97,"children":100},{"className":98},[99],"shloka",[101],{"type":65,"tag":102,"props":103,"children":104},"blockquote",{},[105],{"type":65,"tag":81,"props":106,"children":107},{},[108,111,117,119,124],{"type":109,"value":110},"text","न धर्मोऽर्थमुत्सृजेत्तु न चार्थो धर्ममुत्सृजेत्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":113,"children":114},"em",{},[115],{"type":109,"value":116},"धर्म को अर्थ (धन) का त्याग नहीं करना चाहिए, और न ही अर्थ को धर्म का त्याग करना चाहिए।",{"type":109,"value":118},"\nन च कामोऽर्थधर्मौ च त्रयमेतन्निषेवितम्॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":120,"children":121},{},[122],{"type":109,"value":123},"काम (इच्छाओं) को भी अर्थ और धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, इन तीनों का समान रूप से सेवन करना चाहिए॥",{"type":109,"value":125},"\n— महाभारत (शांतिपर्व, अध्याय १६७, श्लोक ८)",{"type":65,"tag":93,"props":127,"children":128},{},[],{"type":65,"tag":130,"props":131,"children":132},"hr",{},[],{"type":65,"tag":93,"props":134,"children":135},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":137,"children":138},{},[139],{"type":65,"tag":140,"props":141,"children":143},"img",{"alt":142,"src":9},"॥ पुरुषार्थ (धर्म) ॥",[],{"type":65,"tag":93,"props":145,"children":146},{},[],{"type":65,"tag":66,"props":148,"children":150},{"id":149},"पुरुषार्थ",[151],{"type":109,"value":149},{"type":65,"tag":93,"props":153,"children":154},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":156,"children":157},{},[158,160,165],{"type":109,"value":159},"आधुनिक युग में व्यक्ति का जीवन को सरल बनाने के कुछ नियमों का जोड़ है वर्ण, आश्रम और पुरुषार्थ।\nआधुनिक युग में जहाँ हमारे पास सुख-सुविधाओं के असीमित साधन हैं, वहीं जीवन के मूल उद्देश्य को लेकर एक गहरा भटकाव भी है।\nहम धन कमाते हैं, सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हैं, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता है। ऐसा क्यों है? इसका उत्तर हमारी वैदिक जीवनशैली के एक\nअत्यंत मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक ढांचे में छिपा है, जिसे ",{"type":65,"tag":85,"props":161,"children":162},{},[163],{"type":109,"value":164},"'पुरुषार्थ'",{"type":109,"value":166}," कहा जाता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":168,"children":169},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":171,"children":172},{},[173],{"type":109,"value":174},"पुरुषार्थ 4 रूपों में विभाजित होता है, जिसे कहते हैं, धर्म, अर्थ, कर्म और मोक्ष। हम इन्हे एक बार सरल रूप में\nसमझेंगे तत्पश्चात हम वापस पुरुषार्थ पर आएंगे समझने के लिए कि इसका मूल उपयोग कैसे करें। हम यहाँ से\nपुरुषार्थ समझाने के प्रयास का आरम्भ करते हैं। इस अध्याय में हम समझने का प्रयास करते हैं कि पुरुषार्थ कि\nदृष्टि से धर्म का अर्थ क्या है॥",{"type":65,"tag":93,"props":176,"children":177},{},[],{"type":65,"tag":179,"props":180,"children":182},"h2",{"id":181},"परिभाषा-और-दार्शनिक-अर्थ",[183],{"type":109,"value":184},"परिभाषा और दार्शनिक अर्थ",{"type":65,"tag":93,"props":186,"children":187},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":189,"children":190},{},[191],{"type":109,"value":192},"धर्म का शाब्दिक अर्थ है \"जो धारण किया जाए\" — \"धारयति इति धर्मः\"। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान या पूजा-पाठ नहीं,\nअपितु सत्य, न्याय, दया, कर्तव्य, मर्यादा, और सामाजिक उत्तरदायित्व का समुच्चय है। वैशेषिक सूत्र (1.1.2) के अनुसार,\n\"यतो अभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः\" — जिससे लौकिक और पारलौकिक दोनों कल्याण हों, वही धर्म है। उपरोक्त्त श्लोक में एक\nपंक्ति है — \"न धर्मोऽर्थमुत्सृजेत्\", अर्थात धर्म के विरुद्ध जाकर अर्थ का अर्जन नहीं करना चाहिए। धर्म का मूल अर्थ इन संदर्भों में प्रयुक्त\nहोता है - नैतिकता, ऋत, अनुशासन, न्याय इत्यादि। धर्म की सबसे अधिक प्रचलित\nऔर सर्वमान्य व्याख्या इस श्लोक में मिलती है॥",{"type":65,"tag":93,"props":194,"children":195},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":197,"children":199},{"className":198},[99],[200],{"type":65,"tag":102,"props":201,"children":202},{},[203],{"type":65,"tag":81,"props":204,"children":205},{},[206,208,213,215,220],{"type":109,"value":207},"धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।\n",{"type":65,"tag":112,"props":209,"children":210},{},[211],{"type":109,"value":212},"धैर्य (धृति), क्षमा, मन पर नियंत्रण (दम), चोरी न करना (अस्तेय), शुद्धि (शौच) और इंद्रियों को वश में रखना (इन्द्रियनिग्रह)।",{"type":109,"value":214},"\nधीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":216,"children":217},{},[218],{"type":109,"value":219},"बुद्धि (धीः), ज्ञान (विद्या), सत्य और अक्रोध — ये धर्म के दस लक्षण हैं॥",{"type":109,"value":221},"\n— मनुस्मृति",{"type":65,"tag":93,"props":223,"children":224},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":226,"children":227},{},[228],{"type":109,"value":229},"धर्म व्यक्ति को नैतिकता, निष्ठा, सहानुभूति, और सामाजिक दायित्व के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।\nयह जीवन के सभी क्षेत्रों — व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, व्यावसायिक — में संतुलन और मर्यादा स्थापित करता है।\nधर्म के बिना अर्थ और काम अनुचित, असंतुलित और विध्वंसक हो सकते हैं॥",{"type":65,"tag":93,"props":231,"children":232},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":234,"children":235},{},[236],{"type":109,"value":237},"धर्म का अर्थ बहुआयामी है, ये न्याय भी है, ये कर्तव्य भी है, ये अनुशासन भी है, ये नियम भी है और ये संतुलन भी है। ये बहुआयामी होने के कारण इसका मात्र\nकेवल कोई एक सूत्र ढूँढना जो ये बताए की क्या करने से धर्म की प्राप्ति हो लगभग असंभव है। चुंकि इस पुस्तक में हम व्यक्तिगत रूप से जीवन कैसे जीना चाहिए\nइस पर विचार कर रहे हैं तो हम धर्म को व्यक्तिगत मान कर चलते हैं॥",{"type":65,"tag":93,"props":239,"children":240},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":242,"children":243},{},[244,246,251],{"type":109,"value":245},"एक कथा धर्म के इस रूप को सरल रूप में समझा सकती है। एक बार एक ऋषि नदी किनारे बैठे थे। उन्होंने देखा कि एक बिच्छू पानी में डूब रहा है।\nऋषि ने उसे बचाने के लिए अपने हाथ से उठाया, लेकिन बिच्छू ने उन्हें डंक मार दिया। दर्द के कारण ऋषि का हाथ हिला और बिच्छू फिर पानी में गिर गया।\nऋषि ने उसे दोबारा उठाया, बिच्छू ने फिर डंक मारा। ऐसा कई बार हुआ। पास खड़े एक व्यक्ति ने पूछा, \"महाराज, जब यह आपको बार-बार काट रहा है,\nतो आप इसे बचा क्यों रहे हैं?\"\nऋषि ने शांत भाव से कहा:\n\"डंक मारना बिच्छू का धर्म (स्वभाव) है और बचाना मेरा धर्म। जब वह अपना बुरा धर्म नहीं छोड़ रहा, तो मैं अपना अच्छा धर्म क्यों छोड़ूँ?\"\nइस कथा को धर्म की सबसे सरल व्याख्या कहा जा सकता है। यद्यपि धर्म की परिभाषा थोड़ी जटिल है, क्योंकि धर्म\n",{"type":65,"tag":85,"props":247,"children":248},{},[249],{"type":109,"value":250},"व्यक्ति, वस्तु, देश, काल, और स्थिति",{"type":109,"value":252}," के अनुसार बदलता रहता है। केवल धर्म को समझने के लिए कई कई\nपुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। परंतु कोई एक सूत्र यदि किसी को आत्मसात करना हो,\nजो सबसे सरल हो और गूढ़ भी तो वो निम्नलिखित होगा॥",{"type":65,"tag":93,"props":254,"children":255},{},[],{"type":65,"tag":179,"props":257,"children":259},{"id":258},"धर्माजन-का-सूत्र",[260],{"type":109,"value":261},"धर्माजन का सूत्र",{"type":65,"tag":93,"props":263,"children":264},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":266,"children":268},{"className":267},[99],[269],{"type":65,"tag":102,"props":270,"children":271},{},[272],{"type":65,"tag":81,"props":273,"children":274},{},[275,277,282,284,289],{"type":109,"value":276},"ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्य॑जायत।\n",{"type":65,"tag":112,"props":278,"children":279},{},[280],{"type":109,"value":281},"परमेश्वर के प्रदीप्त संकल्प (तप) से ऋत (सृष्टि के नियम) और सत्य (अस्तित्व) प्रकट हुए।",{"type":109,"value":283},"\nततो॒ रात्र्य॑जायत॒ ततः॑ समु॒द्रो अ॑र्ण॒वः॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":285,"children":286},{},[287],{"type":109,"value":288},"उसके बाद अंधकारमयी रात्रि उत्पन्न हुई और फिर जलमय अथाह समुद्र उत्पन्न हुआ॥",{"type":109,"value":290},"\n— ऋग्वेद (१0.१९०.१)",{"type":65,"tag":93,"props":292,"children":293},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":295,"children":296},{},[297],{"type":109,"value":298},"शास्त्रो में कथा आती है कि कर्म कब उत्पन्न होता है। एक बार एक राजा भेष बदल कर प्रजा के बीच घूम रहे थे। तो राजा ने\nअपने मंत्री से कहा की मुझे नहीं पता क्यूँ परंतु ये लकड़ी वाले को देख कर मुझे इसे मारने का मन कर रहा है। तो मंत्री ने कहा\nकी मैं उससे बात करके आता हूँ। मंत्री ने उस लकड़ी वाले से प्रश्न किया तो पता चला की वह कहीं दूर देश से चंदन की लकड़ी बेचने के\nलिए यहाँ आया था और उसे कोई क्रेता नहीं मिल रहा था। तो बातों बातों में उसने मंत्री को कहा की राजा बहुत बूढ़ा हो चला है\nयदि उसकी मृत्यु हो जाए तो मैं अपना चंदन राजभवन को बेच दूँगा। उससे ना केवल मुझे लाभ होगा अपितु मेरा प्रचार भी हो जाएगा।\nमंत्री को यह बात समझ आ गई की क्यूँ राजा को उस लकड़ी वाले को मारने का मन कर रहा था। मंत्री को एक युक्ति सूझती है,\nवह राजा को कहता है महल में यज्ञ की सारी लकड़ी मैं लेकर आऊँगा। और व्यवसायी को कहता है कि राजा को दैनिक रूप\nसे चन्दन की लकड़ी चाहिए, यज्ञ के लिए। अब व्यवसायी को लाभ होने लगता है और वो चाहता है कि राजा जीवित रहे और\nफलता फूलता रहे। अब जब राजा पुनः देखता है तो उसे अच्छा लगता है। और राजा कि जिघांसा भी समाप्त हो गई॥",{"type":65,"tag":93,"props":300,"children":301},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":303,"children":304},{},[305,307,312,314,319],{"type":109,"value":306},"प्रश्न फिर वही है की कर्म कब उत्पन्न होता है। तो शास्त्र कहते हैं ",{"type":65,"tag":85,"props":308,"children":309},{},[310],{"type":109,"value":311},"मनसा, वाचा, कर्मणा",{"type":109,"value":313},"\nअर्थात ",{"type":65,"tag":85,"props":315,"children":316},{},[317],{"type":109,"value":318},"कर्म मन से उत्पन्न होकर वाणी में निवास पाता है, फिर वाणी से कर्म में परिणत होता है",{"type":109,"value":320},"।\nयदि उस लकड़ी वाले नें मंत्री को यह बात कही तो उसे कहने से पहले वह उस बात पर सहस्त्रों बार विचार कर चुका होगा।\nउसकी अपचिकीर्षा (अपकार-इच्छा) ही राजा के प्रति जिघांसा (मारने-इच्छा) में परिणत हुई। और यही कर्म पर भी लागू होता है।\nकी कोई कार्य करने से पहले व्यक्ति उसे स्हस्त्रों बार सोच-विचार कर, सहस्त्रों बार वाणी में कह चुका होता है।\nकर्म कभी भी अचानक उत्पन्न नहीं होता॥",{"type":65,"tag":93,"props":322,"children":323},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":325,"children":326},{},[327],{"type":109,"value":328},"तो अब फिर से प्रश्र उठता है की धर्म के मार्ग फिर कैसे पाया जाए। तो शास्त्र कहते हैं की मन को संतुलित करो।\nजब आपके मन में ऋत होगा और वाणी में सत तो कर्म में भी धर्म स्वयं ही आ जाएगा।\nधर्म क्या है? जो मन में है, वही वाणी में आए, और वही कर्म में उतरे॥",{"type":65,"tag":93,"props":330,"children":331},{},[],{"type":65,"tag":333,"props":334,"children":335},"ol",{},[336],{"type":65,"tag":337,"props":338,"children":339},"li",{},[340,345,347,352,354,359,361,364,367,369,374],{"type":65,"tag":85,"props":341,"children":342},{},[343],{"type":109,"value":344},"ऋत (ब्रह्मांडीय व्यवस्था और मानसिक संतुलन) -",{"type":109,"value":346}," ऋत वह 'प्राकृतिक नियम' या 'कॉस्मिक ऑर्डर' है जिससे पूरा ब्रह्मांड संचालित होता है।\nकर्म की प्रक्रिया में ऋत का अर्थ है ",{"type":65,"tag":85,"props":348,"children":349},{},[350],{"type":109,"value":351},"विचारों की शुद्धता और संतुलन",{"type":109,"value":353},"। ऋत केवल बाहरी व्यवस्था नहीं, अपितु अंतर्मन का वह अनुशासन है जहाँ कोई\nविकार (जैसे क्रोध, लोभ या ईर्ष्या) नहीं होता। जैसे व्यापारी के मन में लोभ आया, तो उसका व्यक्तिगत 'ऋत' भंग हो गया।\nकिसी भी वस्तु की अति नहीं होनी चाहिए, एक संतुलन बनाना मन में वह ही ऋत है। इसे प्राप्त करने का मार्ग\nनिरंतर ",{"type":65,"tag":85,"props":355,"children":356},{},[357],{"type":109,"value":358},"आत्म-अवलोकन (Self-observation)",{"type":109,"value":360}," है। जब हम अपने विचारों के प्रति सजग हो जाते हैं और नकारात्मकता को बीज रूप\nमें ही पहचान लेते हैं, तब मन संतुलित रहता है। नियमित स्वाध्याय और ध्यान से मन की चंचलता को ऋत के साथ जोड़ा जा सकता है।\nअपने मन के विचारों को पहचानो और गिनते रहो। ये चित्त-वृत्ति निरोध का प्रथम सोपान है। ये विश्लेषण भी आवश्यक है इससे आप अपने\nमन के प्रति सजग रहोगे और इससे पहले की आप किसी एक विचार की अति करो आप उसे रोक कर वापस संतुलन बना पाओगे।\nध्यान रहे आपको अपने मन के विचारों को रोकना नहीं है केवल उनकी अति नहीं होने देनी हैं।\nऐसे कुछ ऊपायों से आप मन में ऋत स्थापित कर पाओगे॥",{"type":65,"tag":93,"props":362,"children":363},{},[],{"type":65,"tag":93,"props":365,"children":366},{},[],{"type":109,"value":368},"अब आप उन विचारों में न्याय (तर्क, कल्याण, न्याय) जोड़ दो। तदोपरांत जो आएगा वो आपका अपना स्वाभाव होगा।\nआपको दमन नहीं करना स्वीकार करना है और उन विचारों को दिशा देनी हैं। बुरे से बुरा विचार भी कहीं कहीं पर\nश्रेष्ठ होता है। चलो हिंसा से इसे समझते हैं। मात्र अहिंसा ऋत नहीं होती। सनातन शास्त्रों में एक शब्द है\nक्रोध (वह क्रोध जो अनुचित है), एक है मन्युः (वह क्रोध जो उचित है)। किसी को मारना हो सकता है\nहत्या (निर्दोष को मारना) और वध (दोषी को मारना)। क्षमा केवल याचना के उपरांत दी जाती है।\nआप बिना किसी क्षमा याचना के यदि सहज ही क्षमा दे देते हैं तो आप कायर हैं। ऐसे ही रोष को दबाने के भी दो शब्द है -\nअमर्ष (अन्याय के विरुद्ध अंतर्मन में रोष) एवं अक्षमा (इर्ष्या जन्य अंतर्मन में रोष)। न्याय-अन्याय के विरुद्ध युद्ध के भी\nदो प्रकार हैं धर्मयुद्ध एवं कूटयुद्ध। प्रेम की भी सीमा है उसके पार वह मोह (अंध अुनराग) कहलाता है। आप यदि अपने\nविचारों से पुर्णतः सामंजस्य में हैं तो आप ऋत में हैं। भगवान परशुराम और ऋषि दुर्वासा बहुत ही क्रोधि स्वाभाव के थे। परंतु\nफिर भी सदा ऋत में थे। क्यूँकि वे अपने स्वाभाव को जानते थे। ऐसे ऋषियों को ",{"type":65,"tag":85,"props":370,"children":371},{},[372],{"type":109,"value":373},"'ऋतस्य गोपा' या 'ऋतस्थित'",{"type":109,"value":375}," भी\nकहा जाता है। तो अपने स्वभाव को पहचानो उसे न्याय संगत बनाओ और उस स्वाभाव से प्रेम करो यही ऋत है। किसी भी\nभाव की अति ना करना ही ऋत है। ऋत ब्रह्मांडिय संतुलन है॥",{"type":65,"tag":93,"props":377,"children":378},{},[],{"type":65,"tag":333,"props":380,"children":382},{"start":381},2,[383],{"type":65,"tag":337,"props":384,"children":385},{},[386,391,393,398,400,402,405,431,434,436,441],{"type":65,"tag":85,"props":387,"children":388},{},[389],{"type":109,"value":390},"सत (वाणी की सत्यता) -",{"type":109,"value":392}," जब मन का संतुलन (ऋत) वाणी में उतरता है, तो वह 'सत' या सत्य बन जाता है।\nयहाँ सत्य का अर्थ केवल सच बोलना नहीं, अपितु ",{"type":65,"tag":85,"props":394,"children":395},{},[396],{"type":109,"value":397},"विचार और वाणी में एकरूपता",{"type":109,"value":399}," होना है॥",{"type":109,"value":401},"\n  ",{"type":65,"tag":93,"props":403,"children":404},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":406,"children":408},{"className":407},[99],[409],{"type":65,"tag":102,"props":410,"children":411},{},[412],{"type":65,"tag":81,"props":413,"children":414},{},[415,417,422,424,429],{"type":109,"value":416},"सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् ।\n",{"type":65,"tag":112,"props":418,"children":419},{},[420],{"type":109,"value":421},"सत्य बोलो, प्रिय बोलो, परंतु अप्रिय सत्य न बोलो।",{"type":109,"value":423},"\nप्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":425,"children":426},{},[427],{"type":109,"value":428},"प्रिय झूठ भी मत कहो, यही सनातन धर्म है॥",{"type":109,"value":430},"\n— मनुस्मृति (4.138)",{"type":65,"tag":93,"props":432,"children":433},{},[],{"type":109,"value":435},"जो मन में ऋत के रूप में स्थित है, वही जब वाणी के माध्यम से बाहर आता है, तो वह सत है। यदि मन में कल्याण का भाव है, तो वाणी कभी अहितकारी नहीं होगी।\nइसे ",{"type":65,"tag":85,"props":437,"children":438},{},[439],{"type":109,"value":440},"मौन और विवेकपूर्ण संभाषण",{"type":109,"value":442}," से प्राप्त किया जा सकता है। बोलने से पहले यह विचार करना कि \"क्या यह आवश्यक है, क्या यह सत्य है और क्या इससे किसी का कल्याण होगा?\"\nवाणी को सत की ओर ले जाता है। व्यापारी ने जब अपनी इच्छा को वाणी दी, तो उसने अपने नकारात्मक विचार को कर्म की दिशा में पहला ठोस कदम दे दिया॥",{"type":65,"tag":93,"props":444,"children":445},{},[],{"type":65,"tag":333,"props":447,"children":449},{"start":448},3,[450],{"type":65,"tag":337,"props":451,"children":452},{},[453,458,460,468,470,472,475,501,504],{"type":65,"tag":85,"props":454,"children":455},{},[456],{"type":109,"value":457},"धर्म (ऋत और सत का स्वाभाविक परिणाम) -",{"type":109,"value":459}," धर्म कोई क्रिया नहीं, अपितु जीवन जीने की वह अवस्था है जहाँ आपके कर्म ब्रह्मांडीय नियमों के अनुकूल होते हैं।\nशास्त्र कहते हैं कि यदि आधार (ऋत) और माध्यम (सत) शुद्ध हैं, तो परिणाम (धर्म) स्वतः ही प्रकट होगा। परंतु इसके ऊपर भी कर्म में एक संयम बर्तना आवश्यक है,\nआप ये ध्यान देना चाहिए की आपका कर्म ",{"type":65,"tag":112,"props":461,"children":462},{},[463],{"type":65,"tag":85,"props":464,"children":465},{},[466],{"type":109,"value":467},"स्वहित, परहित, लोकहित",{"type":109,"value":469}," में हो। यथा संभव आपको इसे इन तीनों के लिए लाभकारी बनाना चाहिए। यदि केवल\nएक के लिए भी लाभकारी हो और बाकी के लिए हानिकारक न हो, तो भी वह धर्म के अनुरूप होगा। परंतु यदि इसमें कभी आपको चुनना पड़े तो उसके लिए\nएक सिद्धांत मैं आपको स्मरण कराना चाहूँगा॥",{"type":109,"value":471},"\n   ",{"type":65,"tag":93,"props":473,"children":474},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":476,"children":478},{"className":477},[99],[479],{"type":65,"tag":102,"props":480,"children":481},{},[482],{"type":65,"tag":81,"props":483,"children":484},{},[485,487,492,494,499],{"type":109,"value":486},"त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":488,"children":489},{},[490],{"type":109,"value":491},"कुल (परिवार) के हित के लिए एक व्यक्ति का त्याग किया जा सकता है।",{"type":109,"value":493},"\nग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":495,"children":496},{},[497],{"type":109,"value":498},"ग्राम के हित के लिए कुल का, जनपद के हित के लिए ग्राम का और आत्म-कल्याण (सत्य) के लिए पूरी पृथ्वी का त्याग किया जा सकता है॥",{"type":109,"value":500},"\n— विदुर नीति (महाभारत, उद्योग पर्व 37.17)",{"type":65,"tag":93,"props":502,"children":503},{},[],{"type":109,"value":505},"इस श्लोक में एक दर्शन है की आत्म कल्याण अथवा सत्य के लिए पूरी पृथ्वी को भी त्यागा जा सकता है यही धर्म है॥",{"type":65,"tag":93,"props":507,"children":508},{},[],{"type":65,"tag":179,"props":510,"children":512},{"id":511},"धर्म-की-रक्षा-के-सूत्र",[513],{"type":109,"value":514},"धर्म की रक्षा के सूत्र",{"type":65,"tag":93,"props":516,"children":517},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":519,"children":520},{},[521,523,531],{"type":109,"value":522},"धर्म सारे संसार को धारण करने वाला आधार है और धर्म एक चक्र की भाँति घूमता रहता है। यदि आज आप धर्म की रक्षा करते हैं,\nतो वह कल आपकी रक्षा करेगा। यदि आज आप धर्म को त्याग देते हैं, तो कल धर्म आपको त्याग देगा। इसलिए धर्म केवल स्वयं तक\nसीमित रहने वाली वस्तु नहीं है, अपितु यह वह आधार है जिस पर संपूर्ण समाज टिका होता है। ",{"type":65,"tag":85,"props":524,"children":525},{},[526],{"type":65,"tag":112,"props":527,"children":528},{},[529],{"type":109,"value":530},"\"धर्मो रक्षति रक्षितः\"",{"type":109,"value":532}," अर्थात जो\nधर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। जब समाज में धर्म (न्याय और मर्यादा) सुरक्षित होता है, तभी समाज सुखी और भयमुक्त\nहोता है। शास्त्रों का उद्घोष है— \"आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्\" (आते हुए आततायी का बिना विचार किए वध कर देना चाहिए)॥",{"type":65,"tag":93,"props":534,"children":535},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":537,"children":539},{"className":538},[99],[540],{"type":65,"tag":102,"props":541,"children":542},{},[543],{"type":65,"tag":81,"props":544,"children":545},{},[546,548,553,555,560],{"type":109,"value":547},"वित्तं देहं तथा बुद्धिं धर्मरक्षार्थमुत्सृजेत्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":549,"children":550},{},[551],{"type":109,"value":552},"धर्म की रक्षा के लिए व्यक्ति को अपना धन, शरीर (बल) और बुद्धि समर्पित कर देनी चाहिए।",{"type":109,"value":554},"\nधर्मेण रक्षितो लोकः सुखमेव प्रपद्यते ॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":556,"children":557},{},[558],{"type":109,"value":559},"क्योंकि धर्म द्वारा रक्षित यह संसार ही वास्तविक सुख और शांति को प्राप्त करता है॥",{"type":109,"value":561},"\n— नीतिशतक, हितोपदेश",{"type":65,"tag":93,"props":563,"children":564},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":566,"children":567},{},[568],{"type":109,"value":569},"धर्म की रक्षा के लिए हमें इन तीन स्तरों पर शस्त्र और शास्त्र का उपयोग करना होता है -",{"type":65,"tag":333,"props":571,"children":572},{},[573,583,593],{"type":65,"tag":337,"props":574,"children":575},{},[576,581],{"type":65,"tag":85,"props":577,"children":578},{},[579],{"type":109,"value":580},"बुद्धि (शास्त्र) -",{"type":109,"value":582}," यह वैचारिक रक्षा है। जब अधर्म तर्क और कुतर्कों के माध्यम से समाज को भ्रमित करता है,\nतब बुद्धि और शास्त्र के माध्यम से सत्य की स्थापना करना धर्म-रक्षा है॥",{"type":65,"tag":337,"props":584,"children":585},{},[586,591],{"type":65,"tag":85,"props":587,"children":588},{},[589],{"type":109,"value":590},"बल (शस्त्र) -",{"type":109,"value":592}," यह भौतिक रक्षा है। जहाँ शांतिपूर्ण संवाद विफल हो जाए और असुरक्षा का वातावरण हो,\nवहाँ शारीरिक सामर्थ्य और शस्त्र के माध्यम से न्याय की रक्षा करना अनिवार्य हो जाता है॥",{"type":65,"tag":337,"props":594,"children":595},{},[596,601],{"type":65,"tag":85,"props":597,"children":598},{},[599],{"type":109,"value":600},"धन (संसाधन) -",{"type":109,"value":602}," यह संरचनात्मक रक्षा है। धर्म के कार्यों, शिक्षा,\nऔर न्यायपूर्ण व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए धन का सदुपयोग करना भी धर्म-रक्षा का ही एक रूप है॥",{"type":65,"tag":81,"props":604,"children":605},{},[606],{"type":109,"value":607},"समाज की सुख-शांति किसी राजा या सरकार पर नहीं, अपितु इस बात पर निर्भर करती है कि उस समाज के व्यक्ति अपने संसाधनों (धन, बल, बुद्धि) का कितना अंश धर्म की रक्षा में लगाते हैं।\n\"धर्मो रक्षति रक्षितः\" का यही व्यावहारिक स्वरूप है॥",{"type":65,"tag":93,"props":609,"children":610},{},[],{"type":65,"tag":130,"props":612,"children":613},{},[],{"type":65,"tag":93,"props":615,"children":616},{},[],{"type":65,"tag":179,"props":618,"children":620},{"id":619},"उपसंहार-पुरुषार्थ-धर्म",[621],{"type":109,"value":622},"॥ उपसंहार: पुरुषार्थ (धर्म) ॥",{"type":65,"tag":93,"props":624,"children":625},{},[],{"type":65,"tag":627,"props":628,"children":629},"ul",{},[630],{"type":65,"tag":337,"props":631,"children":632},{},[633,638],{"type":65,"tag":85,"props":634,"children":635},{},[636],{"type":109,"value":637},"धर्म का वास्तविक स्वरूप -",{"type":109,"value":639}," धर्म केवल पूजा-पाठ या अनुष्ठान नहीं, अपितु \"धारयति इति धर्मः\" के अनुसार वह तत्व है\nजो संपूर्ण सृष्टि और समाज को धारण करता है। यह नैतिकता, न्याय, कर्तव्य और अनुशासन का बहुआयामी समुच्चय है।",{"type":65,"tag":93,"props":641,"children":642},{},[],{"type":65,"tag":627,"props":644,"children":645},{},[646],{"type":65,"tag":337,"props":647,"children":648},{},[649,654],{"type":65,"tag":85,"props":650,"children":651},{},[652],{"type":109,"value":653},"पुरुषार्थों में संतुलन -",{"type":109,"value":655}," जीवन की पूर्णता के लिए धर्म, अर्थ और काम का समान सेवन आवश्यक है। श्लोक \"न धर्मोऽर्थमुत्सृजेत्\"\nके अनुसार, धर्म के विरुद्ध जाकर धन अर्जन (अर्थ) करना और केवल इच्छाओं (काम) के पीछे भागना आत्मघाती है।",{"type":65,"tag":93,"props":657,"children":658},{},[],{"type":65,"tag":627,"props":660,"children":661},{},[662],{"type":65,"tag":337,"props":663,"children":664},{},[665,670,672],{"type":65,"tag":85,"props":666,"children":667},{},[668],{"type":109,"value":669},"धर्म प्राप्ति का मनोवैज्ञानिक सूत्र -",{"type":109,"value":671}," कर्म कभी अचानक उत्पन्न नहीं होता, वह 'मनसा-वाचा-कर्मणा' के मार्ग से गुजरता है।\nधर्म की स्थापना के लिए तीन चरणों पर कार्य करना अनिवार्य है:\n",{"type":65,"tag":333,"props":673,"children":674},{},[675,685,695],{"type":65,"tag":337,"props":676,"children":677},{},[678,683],{"type":65,"tag":85,"props":679,"children":680},{},[681],{"type":109,"value":682},"ऋत (मनसा) -",{"type":109,"value":684}," विचारों की शुद्धता और मानसिक संतुलन। अपने नैसर्गिक स्वभाव को पहचानना और न्याय-अन्याय के बीच विवेकपूर्ण संतुलन बनाना।",{"type":65,"tag":337,"props":686,"children":687},{},[688,693],{"type":65,"tag":85,"props":689,"children":690},{},[691],{"type":109,"value":692},"सत (वाचा) -",{"type":109,"value":694}," विचारों और शब्दों की एकरूपता। वाणी ऐसी हो जो सत्य हो, प्रिय हो और जिसमें लोक-कल्याण का भाव हो।",{"type":65,"tag":337,"props":696,"children":697},{},[698,703],{"type":65,"tag":85,"props":699,"children":700},{},[701],{"type":109,"value":702},"धर्म (कर्मणा) -",{"type":109,"value":704}," जब ऋत और सत आचरण में उतरते हैं, तो वह 'धर्म' बनता है।",{"type":65,"tag":93,"props":706,"children":707},{},[],{"type":65,"tag":627,"props":709,"children":710},{},[711],{"type":65,"tag":337,"props":712,"children":713},{},[714,719],{"type":65,"tag":85,"props":715,"children":716},{},[717],{"type":109,"value":718},"कर्म की प्राथमिकता का सिद्धांत -",{"type":109,"value":720}," धर्म के मार्ग पर चलते समय यदि हितों में टकराव हो, तो 'विदुर नीति' का अनुसरण\nकरना चाहिए—कुल के लिए व्यक्ति का, ग्राम के लिए कुल का, और आत्म-कल्याण (सत्य) के लिए पूरी पृथ्वी का त्याग किया जा सकता है।",{"type":65,"tag":93,"props":722,"children":723},{},[],{"type":65,"tag":627,"props":725,"children":726},{},[727],{"type":65,"tag":337,"props":728,"children":729},{},[730,735,737,742],{"type":65,"tag":85,"props":731,"children":732},{},[733],{"type":109,"value":734},"लोकहित का त्रिकोण -",{"type":109,"value":736}," श्रेष्ठ कर्म वही है जो ",{"type":65,"tag":85,"props":738,"children":739},{},[740],{"type":109,"value":741},"स्वहित, परहित और लोकहित",{"type":109,"value":743}," तीनों की कसौटी पर खरा उतरे। यदि\nइनमें से किसी एक का भी कल्याण हो और शेष को हानि न हो, तो वह धर्म है।",{"type":65,"tag":93,"props":745,"children":746},{},[],{"type":65,"tag":627,"props":748,"children":749},{},[750],{"type":65,"tag":337,"props":751,"children":752},{},[753,758,760],{"type":65,"tag":85,"props":754,"children":755},{},[756],{"type":109,"value":757},"धर्मो रक्षति रक्षितः (धर्म-रक्षा) -",{"type":109,"value":759}," धर्म एक चक्र है, यदि आप इसकी रक्षा करेंगे, तो यह आपकी रक्षा करेगा। समाज की सुख-शांति\nइस पर निर्भर है कि व्यक्ति अपने साधनों का उपयोग धर्म की रक्षा में कैसे करता है -\n",{"type":65,"tag":627,"props":761,"children":762},{},[763,772,781],{"type":65,"tag":337,"props":764,"children":765},{},[766,770],{"type":65,"tag":85,"props":767,"children":768},{},[769],{"type":109,"value":580},{"type":109,"value":771}," वैचारिक शुद्धता और सत्य की स्थापना।",{"type":65,"tag":337,"props":773,"children":774},{},[775,779],{"type":65,"tag":85,"props":776,"children":777},{},[778],{"type":109,"value":590},{"type":109,"value":780}," अन्याय और आततायियों के विरुद्ध भौतिक रक्षा।",{"type":65,"tag":337,"props":782,"children":783},{},[784,788],{"type":65,"tag":85,"props":785,"children":786},{},[787],{"type":109,"value":600},{"type":109,"value":789}," न्यायपूर्ण व्यवस्था और लोक-कल्याण के लिए संसाधनों का नियोजन।",{"type":65,"tag":93,"props":791,"children":792},{},[],{"type":65,"tag":130,"props":794,"children":795},{},[],{"type":65,"tag":93,"props":797,"children":798},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":800,"children":801},{},[802,807],{"type":65,"tag":85,"props":803,"children":804},{},[805],{"type":109,"value":806},"निष्कर्ष -",{"type":109,"value":808}," धर्म वह धुरी है जो मनुष्य को पशुता के धरातल से उठाकर पुरुषार्थ के शिखर तक ले जाती है।\nयह स्वयं के विचारों और ब्रह्मांडीय व्यवस्था (Cosmic Order) के बीच का सामंजस्य है।",{"type":65,"tag":93,"props":810,"children":811},{},[],{"type":65,"tag":813,"props":814,"children":816},"swar-lipi",{":is-notation":815},"false",[817],{"type":65,"tag":818,"props":819,"children":820},"table",{},[821,850],{"type":65,"tag":822,"props":823,"children":824},"thead",{},[825],{"type":65,"tag":826,"props":827,"children":828},"tr",{},[829,835,840,845],{"type":65,"tag":830,"props":831,"children":832},"th",{},[833],{"type":109,"value":834},"स्तर (मनुष्य का साधन)",{"type":65,"tag":830,"props":836,"children":837},{},[838],{"type":109,"value":839},"मार्गदर्शक सिद्धांत",{"type":65,"tag":830,"props":841,"children":842},{},[843],{"type":109,"value":844},"क्रियात्मक स्वरूप (क्या करें?)",{"type":65,"tag":830,"props":846,"children":847},{},[848],{"type":109,"value":849},"अंतिम लक्ष्य 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